अंत में पिलातुस ने यहूदियों को खुश करने के लिए जो कि येसु को क्रूस पर चढ़ाना चाह रहे थे, उनकी क्रूस की मौत की घोषणा की। अपने जख्मी कंधों पर भारी क्रूस उठाए येसु ने कलवारी पहाड़ी की यात्रा शुरू की। वह इतना कमजोर हो गया था कि तीन बार क्रूस के नीचे गिरा।
कलवारी पहुँचने पर येसु के कपड़ों को बड़ी बेरहमी से खींचा गया और क्रूस पर ठोंक दिया गया। उसकी माँ, संत योहन और कुछ धार्मिक स्त्रियाँ वहाँ थीं। उसके कुछ अनुयायी दूर खड़े होकर सब देख रहे थे। उन्हें अपने स्वयं की सुरक्षा की पड़ी थी।
पास खड़े यहूदियों ने उनका निरादर कर हँसी-मजाक उड़ाया। पर येसु ने उनके लिए प्रार्थना करते हुए कहा, 'हे पिता, उन्हें क्षमा कर दीजिए, क्योंकि उन्हें ज्ञात नहीं कि वे क्या कर रहे हैं।'
और तीन घंटों की घोर प्राण पीड़ा के पश्चात येसु मर गए। मानव जाति को मुक्ति दिलाने के लिए उसने ऐसा किया।
येसु की मृत्यु के बाद उसके कुछ शिष्य आए और उन्हें एक कब्र में दफना दिया। तीसरे दिन बड़े तड़के भूकंप हुआ, येसु महिमा और विजय के साथ कब्र से बाहर आए।
जब धार्मिक स्त्रियाँ आईं तो उन्होंने दो स्वर्गदूतों को देखा, जिसने उनसे कहा, 'क्या आप येसु को खोज रहे हैं? वे यहाँ नहीं हैं, वे मृतकों में से जी उठे हैं।' उसी दिन संध्या के समय शिष्यगण यहूदियों के डर से द्वार बंद करके जमा हुए थे। वहीं येसु आए और उनके बीच खड़े होकर उनसे कहा, 'तुम्हें शांति मिले।' वे सहम गए और भय के मारे सोचने लगे कि हम कोई प्रेत देख रहे हैं। येसु ने उनसे कहा, 'डरो मत, मैं ही हूँ, मेरे हाथ और पैर देखो।' और उनके साथ वे अंतर्ध्यान हो गए।
येसु, यह साबित करने के लिए कि वे सचमुच मृतकों में से जी उठे हैं, प्रेरितों को समझाने का कार्य पूर्ण करने और अपनी कलीसिया की स्थापना करने के लिए, 40 दिनों तक इस दुनिया में रहे।
इसके बाद वे प्रेरितों को जैतून पहाड़ पर ले गए और अपने हाथ उठाकर उन्हें आशीर्वाद देते हुए स्वर्ग की ओर उड़ते चले गए, जब तक कि एक बादल ने उन्हें नहीं ढँक लिया। तब दो स्वर्गदूत दिखाई दिए और उनसे कहा, 'यही येसु, जिसे तुम अपने बीच से स्वर्ग की ओर जाते देख रहे हो फिर आएँगे, जैसे तुमने उस स्वर्ग की ओर जाते देखा है। तब वह समस्त मानवों का न्याय करेगा।'
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