धर्मग्रंथ से हम जानते हैं कि ईश्वर आत्मा है (योहन 4:24)। जिन वस्तुओं का अस्तित्व है या तो वे पदार्थ हैं या आत्मिक। एक भौतिक पदार्थ वह वस्तु है, जिसे हम देख, छू, सूँघ और सुन सकते हैं। आत्मिक वस्तु वास्तविक होती है, परन्तु वह भौतिक नहीं होती। स्वर्गदूत आत्मिक जीवन होते हैं।
तुम्हारे विचार और इच्छा आत्मिक हैं, तुम सिनेमा के परदे या टीवी पर कभी भी विचार नहीं देख सकते, क्योंकि कोई भी विचारों की तसवीर (फोटो) नहीं खींच सकता, वह आत्मिक है। मनुष्य कुछ अंश तक आत्मिक (उसके विचार और इच्छा) और आंशिक भौतिक (उसका शरीर) है। ईश्वर आत्मा है और इसलिए शारीरिक आँखों से हम उसे नहीं देख सकते हैं।
ईश्वर सर्वत्र है- ऐसा कोई भी स्थान नहीं, जहाँ ईश्वर न हो। हम सदैव उसके सम्मुख रहते हैं। 'तुम से विलग होकर मैं जाऊँगा कहाँ? कहाँ भागकर मैं तेरी आँखों से ओझल हो सकता हूँ? मैं स्वर्ग में चढ़ जाऊँ तो वहाँ तो है ही तू, अधोलोक में विस्तर डालूँ, तो वहाँ भी तू ही है।' (स्तोत्र 138:7-8)
ईश्वर सर्वशक्तिमान है- इसका अर्थ हुआ कि ईश्वर सब कुछ कर सकता है। उसने जो कुछ भी बनाया वे सब उसकी सर्वशक्ति सम्पन्नता का ज्वलंत प्रमाण देते हैं। उसने, मात्र एक शब्द कहकर, संपूर्ण विश्व की रचना की। धर्मग्रंथ के प्रथम अध्याय में ही हम पढ़ते हैं कि किस तरह ईश्वर ने इस सृष्टि एवं उसमें बसने वाली चीजों की रचना की। ईश्वर ने कहा, 'प्रकाश हो जाए और प्रकाश हो गया' 'आका, बन जाए...' 'पृथ्वी अपने ऊपर वनस्पति उत्पन्न करे...' आदि। इस तरह... ईश्वर के लिए कुछ भी कठिन या असंभव नहीं। यदि वह चाहे तो कई दूसरे संसारों की सृष्टि कर सकता है। ईश्वर सर्वज्ञ है- (सबकुछ जानता है), वह सब कुछ भूत, वर्तमान एवं भविष्य... हमारे आंतरिक रहस्यमय विचार, वचन और कर्म भी जानता है। इब्रानियों को लिखते समय संत पौलुस ने लिख 'जिसको हमें अपना लेखा देना है, उसके सामने कोई भी वस्तु छिपी नहीं है, उसकी दृष्टि में सब कुछ बेपरदा और खुला है।' (इब्रा. 4:13)
ईश्वर अनादि है- दाऊद अपने स्तोत्र में कहता है, 'पर्वतों के बनने से पहले या पृथ्वी और सृष्टि के बनने से प्रथम सद्रा-सर्वदा ईश्वर तू विराजमान है।' जब हम कहते हैं कि ईश्वर अनन्त है (सदा से है) तो हमारे कहने का तात्पर्य यही है कि ईश्वर का आदि और अंत नहीं है... ऐसा समय कभी नहीं था, जब ईश्वर नहीं था।
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