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ईश्वर
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एक प्रसिद्ध खगोलज्ञ क्रेट्श्चर का एक वैज्ञानिक मित्र था, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता था। एक दिन यह वैज्ञानिक मित्र क्रेट्श्चर के घर उसकी मेज पर रखे सौरमंडल के मॉडल (नमूने) को चलाते हुए आश्चर्यचकित रह गया। हैण्डल को घुमाने मात्र से, नक्षत्र अपनी-अपनी परिधि में सूर्य का चक्कर लगा सकते थे।

'बड़ा ही निपुण कार्य है।' उसने कहा, 'किसने इसे बनाया?' किसी व्यक्ति विशेष ने नहीं,' परन्तु मुझे बताओ, मैं जानना चाहता हूँ कि किसने इसे बनाया?' इसे किसी ने भी नहीं बनाया... यह अपने आप बन गया।' 'हूँ, मजाक कर रहे हो।' नहीं, यह तो तुम मजाक कर रहे हो।' तुम इस बात पर किसी भी तरह विश्वास नहीं कर रहे हो कि यह छोटा सा मॉडल अपने आप बन गया और फिर भी तुम विश्वास करते हो कि वास्तविक सूर्य, चंद्र और तारे इसके साथ ही पूरा ब्रह्मांड बिना किसी बनाने वाले (निर्माता) के अपने अस्तित्व में आ गया।'

कोई भी वस्तु बिना किसी के बनाए अपने आप नहीं आती। जब तक जमीन में दाना नहीं डाला जाता, भुट्टा अपने आप नहीं बढ़ता। इसी तरह यह सृष्टि और कुछ इसमें है- किसी के द्वारा उत्पन्न हुआ। इसका आरंभ होना ही चाहिए। आखिरकार एक तो कोई होना है, जिसको किसी ने नहीं बनाया। कोई होना ही चाहिए, जो सदा से था। 'कोई' एक जिसका कभी आरंभ नहीं था। उस 'कोई' में असीमित ज्ञान और शक्ति है, जिसका स्वभाव ही विद्यमान होना है।

और ऐसा ही कोई एक है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं, इसलिए हम कहते हैं 'ईश्वर को किसी ने भी नहीं बनाया। वह सदा से था और सर्वदा रहेगा।'

हम ईश्वर के विषय में सबकुछ नहीं जानते, परन्तु हम विवेक और धर्मग्रंथ से सीख सकते हैं कि एक ईश्वर है। विवेक से हम जानते हैं कि कोई एक होना चाहिए... जिसे हम ईश्वर कहते हैं... जिसने सब दृश्य पदार्थों को बनाया, धर्मग्रंथ से हम जानते हैं कि 'उसके पूर्व जब पर्वत नहीं बने थे, या न पृथ्वी और न विश्व ही थे, तब भी अनादि अनंत ईश्वर तू, ही रहा है।' (स्तोत्र 90:2)

और फिर मूर्ख अपने मन में कहता है 'ईश्वर नहीं है।' (स्तोत्र 14:1) और आगे 'देखो, जितना हम जानते हैं, ईश्वर उससे कहीं अधिक बड़ा है।' (योब 36:26)। अब हम अच्छी तरह जानते हैं कि दाऊद के स्तोत्र ग्रंथ में ऐसा कहने का क्या अर्थ है, जब वह कहता है 'समस्त भूतल पर तेरा नाम कितना भव्य है! तूने अपना गौरव स्वर्ग से भी अधिक महान बनाया है।' (स्तोत्र 8:2)
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