हम पवित्र बाइबिल में अकसर पढ़ते हैं कि अनेक ने ख्रीस्त के चमत्कारों और उसकी शिक्षा में विश्वास किया। धीरे-धीरे उसने एक दल एकत्रित कर लिया। वे सब वास्तव में उस पर विश्वास करते और उसका अनुसरण करने के लिए तैयार थे। उसने अपने इन अनुयायियों को 'शिष्य' कहा और इनमें से बारह विशेष तरीके से चुने गए। वे 'प्रेरित' कहलाते थे।
शिष्यों ने ईश्वर की कलीसिया की स्थापना की। जब हम कलीसिया के विषय में बोलते हैं तो किसी भवन या इमारत का अर्थ नहीं लगाते।
कलीसिया, येसु ख्रीस्त में सच्चे विश्वासियों से बनी है। एक दिन येसु ने अपने शिष्यों से पूछा- लोग क्या कहते हैं कि मानव पुत्र कौन है?' वे बोले कोई कहते हैं कि योहन बपतिस्मादाता है, दूसरे कहते हैं एलियास है, या फिर येरेमियास अथवा नबियों में से कोई है। येसु ने उनसे पूछा 'पर तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?' सिमोन पेत्रुस ने उत्तर दिया, 'आप ख्रीस्त हैं, जीवित ईश्वर के पुत्र।' इस पर येसु ने उनसे कहा- 'धन्य हो तुम योनस के पुत्र सिमोन क्योंकि यह रक्त या मांस ने तुम पर प्रकट नहीं किया है, पर मेरे स्वर्गीय पिता ने। मैं भी तुमसे कहा करता हूँ कि तुम पेत्रुस हो और मैं इसी पत्थर पर अपना गिरजा बनाऊँगा और नरक के फाटक इस पर विजयी नहीं होंगे। (मत्ती 16:13-18)
जैसे कि वर्तमान में गिरजाघर हैं, वैसे आरंभ के दिनों में नहीं होते थे। शिष्य लोग निजी घरों और खुले मैदानों में एकत्र हुआ करते थे, परन्तु जब विश्वासियों की संख्या बढ़ने लगी, तो उन्होंने एक भवन या हॉल की जरूरत महसूस की, जिसमें वे एक साथ ख्रीतयाग अर्पित कर सकें, प्रार्थना एवं भजन गा सके और धर्म शिक्षा ले सकें। लोग सुसमाचार प्रचार के लिए दान स्वरूप पैसे दिया करते थे।
स्मरण रहे, ख्रीस्त ने यह नहीं कहा- 'पेत्रुस तुम चट्टान हो और इसी चट्टान पर मैं अपनी कलीसियाओं को बनाऊँगा।' उसने कभी भी बहुल का उपयोग नहीं किया जिसका अर्थ 'बहुत' कलीसिया होता है। ख्रीस्त ने केवल एक ही कलीसिया की स्थापना की क्योंकि उसी कलीसिया में और उसी द्वारा हमारी अनन्त मुक्ति के समस्त साधन मिलते हैं।
कलीसिया के चार विशिष्ट चिह्न हैं जो अन्य कलीसिया में नहीं पाए जाते हैं।
1. कलीसिया एक है, इसका अर्थ है, उसके समस्त सदस्य एक ही विश्वास की घोषणा करते हैं, एक ही ख्रीस्तयाग है, वही सात संस्कार हैं और सब एक ही सांसारिक प्रधान, संत पापा के साथ संयुक्त हैं।
|