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गृहस्‍थ के कर्तव्‍य
3. पत्नी की सेवा- पत्नी-रूपी पश्चिम दिशा की पूजा के पाँच अंग हैं-
1. उसे मान देना, 2. उसका अपमान न होने देना, 3. एक पत्नी व्रत का आचरण करना, 4. घर का कारोबार उसे सौंपना, 5. उसे वस्त्र और आभूषणों की कमी न पड़ने देना।

अनुग्रह- पति यदि इन पाँच अंगों से पत्नी की पूजा करता है, तो वह अपने पति पर पाँच प्रकार का अनुग्रह करती हैं-
1. घर में सुंदर व्यवस्था रखती है, 2. नौकर-चाकरों को प्रेम के साथ रखती है, 3. पतिव्रता रहती है, 4. पति उसे जो संपत्ति देता है, उसकी रक्षा करती है, उसे उड़ाती नहीं, 5. घर के सब काम-काजों में तत्पर रहती है।

4. बंधु-बांधवों की सेवा- बंधु-बांधवरूपी उत्तरदिशा की पूजा के ये पाँच अंग हैं-
1. देने योग्य वस्तु उन्हें देना, 2. उनसे मधुर वचन बोलना, 3. उनके उपयोगी बनना, 4. उनके साथ निष्कपट व्यवहार रखना, 5. समान भाव से बर्ताव करना।

अनुग्रह- जो आर्य श्रावक इन पाँच अंगों से अपने बंधु-बांधवों की पूजा करता है, उस पर वे पाँच प्रकार का अनुग्रह करते हैं-
1. उस पर एकाएक संकट आ पड़ने पर वे उसकी रक्षा करते हैं, 2. संकट काल में वे उसकी सम्पत्ति की भी रक्षा करते हैं, 3. विपत्ति में उसे धीरज बँधाते हैं, 4. विपत्ति-काल में उसका त्याग नहीं करते, 5. उसके बाद उसकी संतान पर भी उपकार करते हैं।

5. सेवक की सेवा- सेवकों को सूचित करनेवाली जो नीचे की दिशा है, उसकी पूजा के पाँच अंग है-
1. उनकी शक्ति देखकर उनसे काम करने को कहना, 2. उन्हें यथोचित वेतन देना, 3. बीमार पड़ें तो उनकी सेवा-सुश्रूषा करना, 4. यथावसर उन्हें उत्तम भोजन देना, 5. समय-समय पर उनकी उत्तम सेवा के बदले उन्हें इनाम इत्यादि देना।

अनुग्रह- इन पाँच अंगों से मालिक अगर सेवकों की पूजा करता है तो अपने मालिक पर वे पाँच प्रकार का अनुग्रह करते हैं-
1. मालिक के उठने से पहले उठते हैं, 2. मालिक के सोने के बाद सोते हैं, 3. मालिक के सामान की चोरी नहीं करते, 4. उत्तम रीति से काम करते हैं, 5. अपने मालिक का यश गाते हैं।

6. साधु-संतों की सेवा- साधु-संतों की जो ऊपर की दिशा है, उसकी पूजा के ये पाँच अंग हैं-
1. शरीर से आदर करना, 2. वचन से आदर करना, 3. मन से आदर करना, 4. शिक्षा के लिए आएँ तो उन्हें किसी प्रकार की हानि न पहुँचाना, 5. उन्हें उनके उपयोग की वस्तु देना।

अनुग्रह- इन पाँच अंगों से जो आर्य श्रावक साधु-संतों की पूजा करता है, उस पर वे साधु-संत छः प्रकार का अनुग्रह करते हैं-
1. पाप से उनका निवारण करते हैं, 2. कल्याणकारक मार्ग पर उसे ले जाते हैं, 3. प्रेमपूर्वक उस पर दया करते हैं, 4. उसे उत्तम धर्म की शिक्षा देते हैं, 5. शंका-निवारण करके उसके मन का समाधान करते हैं, 6. उसे सुगति का मार्ग दिखा देते हैं।

दान, प्रिय वचन, अर्थचर्या और समानात्मकता, अर्थात दूसरों को अपने समान समझना, ये लोक-संग्रह के चार साधन हैं। बुद्धिमान मनुष्य इन चारों साधनों का उपयोग करके जगत में उच्चपद प्राप्त करता है।
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