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गृहस्‍थ के कर्तव्‍य
6. आलस्य- आलस्य के फल भी महान भयंकर हैं। एक दिन आलसी आदमी इस कारण काम नहीं करता कि आज बड़ी कड़ाके की सर्दी पड़ रही है और दूसरे दिन बेहद गर्मी के कारण वह काम से जी चुराता है। किसी दिन कहता है कि अब तो शाम हो गई है, कौन काम करने जाए और किसी दिन वह कहता है कि अभी तो बहुत सवेरा है, काम का समय अभी कहाँ हुआ? इस तरह आज का काम कल के ऊपर छोड़कर वह कोई नई सम्पत्ति का उपार्जन कर नहीं सकता और अपने पूर्वजों का पूर्वार्जित धन नष्ट करता जाता है।

छः दिशाओं की पूज
श्रावक को चारों कर्म-क्लेशों, चारों पाप कारणों और छहों विपत्ति-द्वारों को त्याग करने के बाद गृहस्थ को छः दिशाओं की पूजा आरंभ करनी चाहिए। गृहस्थ की प्रत्येक दिशा के पाँच-पाँच अंग होते हैं। इनके परिणामस्वरुप पाँच प्रकार के अनुग्रह प्राप्त होते हैं। छः दिशाओं की पूजा इस प्रकार है :

1. माता-पिता की सेवा
2. गुरु या आचार्य की सेवा
3. पत्नी की सेवा
4. बंधु-बांधवों की सेवा
5. सेवक की सेवा
6. साधु-संतों की सेवा।

यहाँ माता-पिता को पूर्व-दिशा, गुरु को दक्षिण दिशा, पत्नी को पश्चिम दिशा, बंधु-बांधव को उत्तर दिशा, दास और श्रमिक को नीचे की दिशा तथा साधु-संत को ऊपर की दिशा समझना चाहिए।

1. माता-पिता की सेवा- माता-पितारूपी पूर्व दिशा की पूजा के पाँच अंग हैं-

1. उनका काम करना, 2. उनका भरण-पोषण करना, 3. कुल में चले आए हुए सत्कर्मों को जारी रखना, 4. माता-पिता की सम्पत्ति का भागीदार बनना, 5. दिवंगत माता-पिता के नाम पर दान-धर्म करना।

अनुग्रह- यदि इन पाँच अंगों से माता-पिता को पूजा जाए तो वे अपने पुत्र पर पाँच प्रकार का अनुग्रह करते हैं-

1. पाप से उसका निवारण करते हैं, 2. कल्याणकारक मार्ग पर उसे ले जाते हैं, 3. उसे कला-कौशल सिखाते हैं, 4. योग्य स्त्री के साथ उसका विवाह कर देते हैं, 5. उपयुक्त समय आने पर अपनी संपत्ति उसे सौंप देते हैं।

2. गुरु या आचार्य की सेवा- गुरुरूपी दक्षिण दिशा की पूजा के पाँच अंग हैं-

1. गुरु को देखते ही खड़े हो जाना, 2. गुरु बीमार पड़ें तो उनकी सेवा करना, 3. गुरु जो सिखाएँ, उसे श्रद्धापूर्वक समझ लेना, 4. गुरु का कोई काम हो तो कर देना, 5. वह जो विद्या दें, उसे उत्तम रीति से ग्रहण करना।

अनुग्रह- शिष्य यदि इन पाँच अंगों से गुरु की पूजा करता है, तो गुरु उस पर पाँच प्रकार का अनुग्रह करता है-
1. सदाचार की शिक्षा देता है, 2. उत्तम रीति से विद्या पढ़ाता है, 3. जितनी भी विद्याएँ उसे आती हैं, उन सबका ज्ञान शिष्य को करा देता है, 4. अपने संबंधियों और मित्रों में उसके गुणों का बखान करता है, 5. जब कहीं बाहर जाता है, तब ऐसी व्यवस्था कर देता है कि जिससे शिष्य को खाने-पीने की कोई अड़चन न पड़े।
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