मुख्य पृष्ठ > धर्म-संसार > धर्म-दर्शन > बौद्ध धर्म
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
गृहस्‍थ के कर्तव्‍य
चार कर्म-क्लेश
1. प्राणातिपात (प्राणियों को मारना)
2. अदत्तादान (चोरी करना)
3. परदारगमन (काम-संबंधी दुराचार करना)
4. मृषावाद (झूठ बोलना)
सामान्य भाषा में चार कर्म-क्लेश हैं- हिंसा, चोरी, व्यभिचार और असत्य-भाषण। गृहस्थ को इनसे हमेशा दूर रहना चाहिए।

पाप के चार स्थान
1. स्वेच्छाचार के रास्ते में जाकर पाप कर्म करना
2. द्वेष के रास्ते में जाकर पापकर्म करना
3. मोह के रास्ते में जाकर पाप कर्म करना
4. भय के रास्ते में जाकर पाप कर्म करना।

निम्न चार कारणों के वश होकर मूढ़जन पाप-कर्म करते हैं। आर्य श्रावक को इनमें से किसी कारण के वश होकर पाप कर्म में प्रवृत्त नहीं होना चाहिए। आर्य श्रावक न छंद के रास्ते जाता है, न द्वेष के, न मोह के रास्ते जाता है, न भय के।

संपत्ति-नाश के कारण- छः अपाय-मुख
भगवान बुद्ध ने बताया कि भोगों के अपाय-मुख छः हैं। इन्हें संपत्ति-नाश के छः दरवाजे भी कहते हैं। आर्य श्रावक को इनसे बचना चाहिए।

1. मद्यपान या शराब पीना- मद्यपान के व्यसन से सम्पत्ति का नाश होता है, इसमें तो संदेह ही नहीं। फिर मद्यपान से कलह बढ़ता है और वह रोगों का घर तो है ही। इससे अपकीर्ति भी पैदा होती है। यह व्यसन लज्जा को नष्ट और बुद्धि को क्षीण कर देता है। मद्यपान के छः दुष्परिणाम हैं।

2. संध्या में चौरस्ते की सैर (रात में आवारागर्दी)- जिसे रात में इधर-उधर घूमने-फिरने का चस्का लग जाता है, उसका शरीर स्वयं आरक्षित रहता है। उसकी स्त्री और बाल-बच्चे भी सुरक्षित नहीं रह सकते। वह अपनी सम्पत्ति नहीं संभाल सकता। उसे हमेशा यह डर लगा रहता है कि कहीं कोई मुझे पहचान न ले। उसे झूठ बोलने की आदत पड़ जाती है और वह अनेक कष्टों में फँस जाता है।

3. नाच-तमाशे का व्यसन- नाच-तमाशे देखने में भी कई दोष हैं। नाच-तमाशा देखने वाला हमेशा इसी परेशानी में पड़ा रहता है कि आज कहाँ नाच है, कहाँ तमाशा है, कहाँ गाना-बजाना है। अपने काम-धंधे का उसे स्मरण तक नहीं रहता।

4. जुआ- जुआरी आदमी जुए में अगर जीत गया तो दूसरे जुआरी उससे ईर्ष्या करने लगते हैं और अगर हार गया तो उसे भारी दुःख होता है और उसके धन का नाश तो होता ही है। उसके मित्र और उसके सगे-संबंधी भी उसकी बात पर विश्वास नहीं करते। उनकी ओर से उसे बार-बार अपमान सहन करना पड़ता है। उसके साथ कोई नया रिश्ता नहीं जोड़ना चाहता क्योंकि लोगों को यह लगता है कि यह जुआरी आदमी अपने कुटुंब का पालन-पोषण करने में असमर्थ है।

5. दुष्ट मनुष्यों से मित्रता या संगति- दुष्टों की संगति का भी दुष्परिणाम ऐसे ही है। धूर्त, दारूखोर, लुच्चे, चोर आदि सभी तरह के नीच मनुष्यों का साथ होने से दिन-प्रतिदिन उसकी स्थिति गिरती ही जाती है और अंत में वह हीन से हीन दशा को पहुँच जाता है।
<< 1 | 2 | 3 | 4  >>  
और भी
तृष्णा का बंधन
विपश्यना क्यों ?
बुद्धपद
बौद्ध धर्म में ब्रह्म-विहार क्या है?
बुद्ध स्वामी का जीवन परिचय
बौद्ध धर्म में ब्रह्म-विहार क्या है?