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झारखंड के देवघर का श्रावणी मेला
किसी महाकुंभ से कम नहीं
- विनोद बंध

Sravni Fair
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श्रावणी मेले के दिन करीब आ गए हैं। शिवभक्तों के मन में बाबा के दर्शन की उमंगें हिलोरे लेने लगी हैं। वैसे आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन यानी 5 जुलाई से ही यह मेला प्रारंभ हो जाएगा लेकिन सावन का पहला सोमवार 6 जुलाई को है और उस दिन जलाभिषेक के लिए देशभर से शिवभक्तों की भीड़ उमड़ेगी। वैसे कुछ वर्ष पहले तक सोमवार को जल चढ़ाने की जो होड़ रहती थी, वह अब उतनी नहीं है।

सवा महीने तक चलने वाले इस मेले में अब हर रोज कावंड़ियों की भीड़ लाख की संख्या पार कर जाती है। इस अर्थ में यह किसी महाकुंभ से कम नहीं है। झारखंड के देवघर में लगने वाले इस मेले का सीधा सरोकार बिहार के सुलतानगंज से है। यहीं गंगा नदी से जल लेने के बाद 'बोल बम' के जयकारे के साथ कांवड़िये नंगे पाँव देवघर की यात्रा आरंभ करते हैं।

आज के बदले परिवेश में 'संतोषम्‌ परमम्‌ सुखम्‌' जैसी अवधारणा ध्वस्त हो गई है। सुख-सुविधा के प्रति सबकी लालसा बढ़ी है। इसे हासिल करने के उपायों में देवी-देवताओं की पूर्जा-अर्चना को भी महत्व प्राप्त हुआ है। आस्थावान लोगों की संख्या में जबर्दस्त बढ़ोत्तरी के पीछे मनोकामनापूर्ति की यही लिप्सा काम कर रही है। ऐसे में देवघर स्थित शिवलिंग का अपना खास महत्व है क्योंकि शास्त्रों में इसे मनोकामना लिंग कहा गया है। यह देश के 12 अतिविशिष्ट ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। यह वैद्यनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता है।

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पूर्वी चंपारण के मूल निवासी नगनारायण सिंह पिछले 25 वर्षों से कांवड़ लेकर देवघर जाते हैं और इस बार भी वह अभी से तैयारी में जुट गए हैं और ऐसे शिवभक्तों की संख्या हजारों में है जो बीस-पचीस वर्षों से हर वर्ष कांवड़ लेकर बाबा के दरबार पहुँचते हैं। ऐसे शिवभक्त अपनी तमाम कामयाबी का श्रेय शिव को देते हैं।

देवघर के इस श्रावणी मेले के साथ बाजार का अर्थशास्त्र भी जुड़ा है। ऐसे कई उद्योग हैं जिन्हें जीवित रखने के लिए अकेले यह मेला काफी है। कांवड़ियों के लिए कुछ वस्तुएँ साथ ले जाना आवश्यक होता है। इसमें टॉर्च, नया कपड़ा मसलन गंजी और बनियान, तौलिया, चादर, दो जल पात्र, अगरबत्ती के आठ-दस पैकेट, मोमबत्ती, माचिस आदि। एक कांवड़िया कम से कम एक हजार रुपए की खरीदारी करता है।

श्रावणी मेले में सुल्तानगंज से गंगा जल लेकर प्रस्थान करने वाले कांवड़ियों की संख्या सवा महीने में पचास लाख के करीब पहुँच जाती है। इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। इस तरह सिर्फ श्रावणी मेले में पाँच सौ करोड़ की खरीदारी इन वस्तुओं की होती है। इसके अलावा रास्ते में चाय, ठंडे पेय, खाद्य आदि पर भी प्रति कांवड़िया चार से पाँच दिन में दो से ढ़ाई सौ रुपए खर्च आता है। देवघर में जलाभिषेक के बाद पेड़ा, चूड़ी, सिंदूर और अन्य सामग्री की कम से कम इतने की ही खरीदारी की जाती है यानी श्रावणी मेले का अर्थशास्त्र कुल मिलाकर करीब एक हजार करोड़ का है।

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