- ज्योतिर्मय भारत में धर्म के व्यावसायिक इस्तेमाल का पहला श्रेय ओशो को जाता है। उन्होंने अपना प्रवचन सुनने वालों के ऊपर टिकट तक लगाए हाल के दिनों में यह रुझान तेजी से बढ़ा है। ज्यादातर आधुनिक बाबा और ओशो के घोर आलोचक बाबा रामदेव और आसाराम बापू भी अपने भक्तों से शुल्क लेते हैं नवंबर 2008 के अंतिम सप्ताह में नोएडा में हुआ ब्रह्मनाद महोत्सव अपने अनूठेपन और भव्य स्वरूप के कारण लोगों को अब भी याद है। एक हजार सितारों की धुन और मंच पर विशिष्ट व्यक्तियों की उपस्थिति के साथ आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर को सुनना हजारों लोगों के लिए एक खास अनुभव से गुजरना था। श्रोताओं की संख्या लाखों में थी। संख्या चाहे जो भी हो लेकिन सवाल यह है कि हजारों या लाखों लोगों तक संदेश कैसे पहुँचाया गया होगा? उससे भी बड़ी बात यह कि लोगों की इतनी बड़ी भीड़ जुटाई कैसे गई होगी? रविशंकर के भक्तों की मानें तो लोग रविशंकर की प्रेरणा से और उन पर अपनी श्रद्धा के कारण वहाँ पहुँचे थे। अनुमान के अनुसार इस आयोजन पर 30-35 लाख रुपए जरूर खर्च हुए होंगे। रविशंकर द्वारा एक वर्ष में इस स्तर के न सही पर इससे कुछ हल्के-फुल्के दस-बारह आयोजन तो अमूमन होते ही हैं। बेंगलुरु को केंद्र बनाकर करीब 140 देशों में आठ हजार से ज्यादा शाखाओं में फैल चुके आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक रविशंकर के शिष्यों की संख्या करीब पाँच करोड़ है जिन्हें गुरुजी ने सुदर्शन क्रिया की शिक्षा दी है। ध्यान और योग की यह तकनीक गुरु रविशंकर द्वारा ही विकसित की गई है। कुछ बैठकों से लेकर सप्ताह-दस दिन का यह पाठ्यक्रम बाकायदा शुल्क देकर सीखा जाता है लेकिन यह न मान लें कि गुरुजी का आध्यात्मिक वैभव मात्र इसी शुल्क की देन है। रविशंकर किसी जमाने में महर्षि महेश योगी के साथ थे। कहते हैं कि धर्म मिशन के गुर सीखने के लिए उन्होंने अपने समय के कई प्रतिष्ठित संत-महात्माओं का संसर्ग किया। ओशो भी उन धर्मगुरुओं में एक थे, जहाँ से उन्होंने कुछ अर्जित किया। वहाँ ज्यादा दिन रुकना नहीं हो सका। 1981 के बाद उन्होंने अपने मिशन पर जोर देना शुरू किया। इन्हीं दिनों ओशो भारत छोड़कर अमेरिका चले गए थे। उनके जाने के बाद बने शू्न्य को भरने के लिए रविशंकर ने आर्ट ऑफ लिविंग का गठन किया। इन्हें पाँव जमाने में वक्त लगा। 1992 के आसपास उन्हें कामयाबी मिलनी शुरू हुई तो फिर वे उठते ही चले गए। |