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धर्म-दर्शन एवं अन्योन्याश्रित विश्व व्यवस्था-1
- महावीर सरन जैन

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वैज्ञानिक प्रगति तथा तकनीकी विकास के कारण आज दुनिया बहुत छोटी हो गई है। विश्व एकता की चेतना का भी तेजी से विकास हुआ है। व्यक्ति यह समझने तथा पहचानने लगा है कि विश्व के एक भाग की घटना का प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ता है। सम्पूर्ण पृथ्वीलोक को एक इकाई मानकर चिन्तन होना आरम्भ हो गया है। इस चिन्तन के प्रेरणा-स्रोत आज दर्शन, धर्म, काव्य, कला आदि ही नहीं हैं अपितु विज्ञान, तकनीकी विकास, यातायात, सूचना-क्रान्ति आदि अनेक कारक हैं।

अब हम यह अनुभव करने लगे हैं कि हमारे पृथ्वी लोक के मनुष्य-जगत एवं प्रकृति-जगत की अनेक ऐसी समस्याएँ हैं जिनका समाधान एकदेशीय धरातल पर सम्भव नहीं है। समस्याएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, परस्पर गुँथी हुई हैं। इनके समाधान के लिए विश्वजनीन दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इनका समाधान सार्वदेशिक धरातल पर ही सम्भव है।

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विश्व के देशों में इस बात पर आम सहमति विकसित होनी चाहिए कि विकास का अर्थ केवल मशीनों द्वारा अधिक उत्पादन करना नहीं है। विकास अपने में साध्य नहीं है। विकास केवल साधन है। विकास का लक्ष्य मनुष्य है। विकास साधन है और साध्य है - मनुष्य जाति का हित-सम्पादन। विकास का उद्देश्य है - मनुष्य की समग्र उन्नति। विश्व में विकास की ऐसी व्यवस्था स्थापित हो जिससे मनुष्य के अन्तर्जात गुणों का पूर्ण विकास सम्भव हो सके। उसकी सृजनशीलता की विविध रूपों में पूर्ण अभिव्यक्ति सम्भव हो सके, मनुष्य की भौतिक सन्तुष्टि के साथ-साथ उसकी आत्मिक सन्तुष्टि भी हो सके। मनुष्य अपना जीवन सुखी बनाने के साथ-साथ उसे सार्थक भी बना सके।

कुछ व्यवस्थाओं ने व्यक्तिगत स्वातंत्र्य को तथा कुछ ने आर्थिक समानता को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना। मिखाइल गोर्बाचोव की 'परेस्त्रोइका' या पुनर्रचना की नीति के प्रभाव के कारण पूर्वी यूरोप के देशों में तथाकथित साम्यवादी शासन-व्यवस्था के दुर्ग ढह चुके हैं तथा वहाँ जनक्रान्तियों की सफलता के कारण लोकतंत्र स्थापित हो गया है। पूँजीवादी देशों की सरकारें भी समाज के निर्धन, विपन्न, कमजोर, बेसहारा, बेरोजगार वर्गों के लिए कल्याणकारी कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं। 'पूँजी' को विपन्न वर्गों के लिए समायोजित किया जा रहा है। अब धीरे-धीरे विश्व के अधिकांश देशों ने नए जीवन-मूल्यों को मान्यता देना आरम्भ कर दिया है।

इनमें निम्नलिखित मूल्यों का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा :- (1) स्वतन्त्रता (2) व्यक्ति की प्रतिष्ठा (3) जनशक्ति एवं जन-आकांक्षाओं का आदर (4) समता (5) समाज के सुविधाविहीन वर्गों के प्रति दायित्व-बोध (6) पुरुष एवं स्त्री की समानता (7) विश्व-बन्धुत्व एवं विश्व-मैत्री (8) अन्तरराष्ट्रीय सद्भावना (9) एक-दूसरे की संस्कृति, परम्परा, धर्म, रीति-रिवाजों के प्रति आदर (10) लोकतन्त्रात्मक शासन-व्यवस्था।

विभिन्न राष्ट्रों के बीच समानता तथा आम सहमति के आधार पर समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त होना चाहिए, पारस्परिक लाभ के आधार पर विकास के लिए सार्वभौमिक सहयोग के सिद्धान्त को मान्यता प्राप्त होनी चाहिए। (क्रमश:)
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