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सुखी जीवन के लिए निष्कपटता
बचें छल एवं कपट से
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इन मानसिक रोगों से बचने के लिए निष्कपट होना होता है। निष्कपटता से मनुष्य का आन्तरिक संघर्ष चेतना की सतह पर आ जाता है। जो वासना, स्मृति एवं विचार दमित अवस्था में अचेतन मन में रहते हैं, वे चेतन मन के धरातल पर आ जाते हैं। इस प्रकार के प्रकाशन से अचेतन मन की ग्रंथियाँ ऋजु होकर शक्तिहीन हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति चेतन मन के धरातल पर स्वतः के प्रयत्न द्वारा सप्रयास आत्मनियन्त्रण कर सकता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से व्यक्ति कपट के कारण अपना प्रकृत स्वभाव भूल जाता है। राग-द्वेष तथा इन्द्रियों के वशीभूत होकर आत्मा का शुद्व स्वभाव आच्छादित हो जाता है। इस तथ्य को प्रायः सभी दर्शन स्वीकार करते हैं। आत्मा (जीव) के साथ जैन दर्शन में पौद्गलिक कर्मों का, बौद्व दर्शन में तृष्णा का, वेदान्त दर्शन में माया का, सांख्य-योग दर्शन में प्रकृति का संयोग माना गया है।

कपट एवं कुटिलता के कारण बन्धन की ग्रन्थियाँ जुड़ती जाती हैं। निष्कपटता से इन ग्रंथियों की जकड़न दूर हो जाती है, गाँठे ऋजु हो जाती हैं। हृदय सरल, स्पष्ट, निष्कपट हो जाता है। इसी के पश्चात्‌ हृदय शुद्ध होता है। आत्म-संशोधन होता है, जहाँ धर्म ठहर सकता है। कपट का परित्याग करके ही व्यक्ति सत्य की साधना कर सकता है तथा अन्तःकरण की शुद्धि कर सकता है।

स्वस्थ शरीर, शुद्ध मन तथा आत्मानुसंधान के अतिरिक्त पारिवारिक एवं सामाजिक सुख एवं शांति की दृष्टि से भी आर्जव अथवा निष्कपटता का महत्व है। परस्पर मैत्रीभाव के लिए निष्कपटता के सतत अभ्यास की आवश्यकता है। कुटिलता के कारण पारिवारिक जीवन में अविश्वास उत्पन्न होता है। सामाजिक जीवन में छल, छद्म एवं विश्वासघात की वृत्तियाँ पनपती हैं।

पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में परस्पर मैत्रीभाव उत्पन्न करने के लिए निष्कपटता के सतत अभ्यास की आवश्यकता असंदिग्ध है। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन की सुख शांति तथा परस्पर मैत्री भाव का आधार है- परस्पर निष्कपटता, स्पष्टवादिता तथा ईमानदारी। प्रेम, विश्वास एवं बन्धुत्व के बिना व्यक्ति का जीवन सुखी नहीं बन सकता। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन की सुख शांति के लिए परस्पर मैत्रीभाव का होना आवश्यक है। सुखी जीवन के लिए इसी कारण सीधा, सरल एवं निष्कपट होना जरूरी है।
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