मुख पृष्ठ > धर्म-संसार > धर्म-दर्शन > आलेख > सुखी जीवन के लिए निष्कपटता
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजिएयह पेज प्रिंट करें
 
सुखी जीवन के लिए निष्कपटता
बचें छल एवं कपट से
- प्रो. महावीर सरन जै

dharm darshan
ND
विनम्रता से सरलता आती है। सरलता से निष्कपटता की वृत्ति विकसित होती है। सरलता से अपने दोषों की आलोचना करनेवाला व्यक्ति माया एवं मद से मुक्त हो जाता है। व्यक्ति का हृदय सरल, स्पष्ट, निष्कपट हो जाता है। क्या सुखी जीवन के लिए सरलता, निष्कपटता, स्पष्टवादिता तथा ईमानदारी का होना जरूरी है।

समाज में यह धारणा भी है कि भौतिक विकास के लिए व्यक्ति को चालबाज, तिकड़मी, बेईमान, धोखेबाज होना चाहिए। चालबाज, तिकड़मी, बेईमान, धोखेबाज, कुटिल, कपटी, छली, प्रपंची व्यक्ति को व्यावहारिक चालाक, पटु माना जाता है। यह माना जाता है कि ऐसा व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ जाता है, धनी हो जाता है, संपन्न हो जाता है। उसके पास सारी सुख सुविधाएँ हो जाती हैं।

छल और कपट को तात्कालिक स्वार्थसिद्धि के कौशल के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि जीवन में परस्पर अविश्वास, अपवित्रता एवं कुटिलता बढ़ती जा रही है। कोई किसी के कथन पर विश्वास नहीं करता तथा उसके प्रत्येक क्रियाकलाप को संशय एवं सन्देह की दृष्टि से देखता है। चूँकि भोगवादी विचारधारा इन्द्रियों की तृप्ति में ही सुख मानती है इस कारण कपटता को सुखी जीवन का आधार मान लिया जाता है।

क्या इच्छाओं का कोई अन्त है। कामनाएँ तो आकाश के समान अनन्त हैं। क्या संपन्नता सुखी जीवन का आधार है। क्या यह सत्य है कि जो जितना संपन्न है वह उतना ही सुखी है। यदि ऐसा नहीं है तो यह विचारणीय है कि व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन की वास्तविक सुख शांति का क्या आधार है।

छल एवं कपट का जिस व्यक्ति के जीवन में जितना प्राबल्य होता है उसके चेतन एवं अचेतन मन की भावना का अन्तर उतना ही अधिक होता है। ऐसे व्यक्ति की स्मरण-शक्ति, कल्पना, चित्त की एकाग्रता एवं इच्छाशक्ति दुर्बल होती जाती है। उसमें न तो चरित्र बल रह जाता है और न व्यक्तित्व की पवित्रता। कपट के कारण व्यक्ति खुल नहीं पाता, अचेतन मन की खोज करके प्रत्येक प्रकार के द्वन्द्व को चेतना की सतह पर नहीं ला पाता। उसके अचेतन मन में जो भाव एवं विचार एकत्र होते हैं वे उसके व्यक्तित्व को विभाजित कर देते हैं।

दुःखों की जड़ मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हमारे ही मन में है। ग्रन्थियों के कारण हम अन्तर्मन की खोज नहीं कर पाते तथा दुःख का कारण सदा बाह्य वातावरण में खोजते रहते है। सत्य जानने का मार्ग अवरूद्ध हो जाता है। अंधेरी कोठरी में बन्द व्यक्ति अपने से ही लड़ता रहता है। मानसिक संघर्ष के कारण बाहरी जगत में संघर्षात्मक स्थितियाँ उत्पन्न कर लेता है। अहंकार मन के कपट को बढ़ा देता है। ऐसी स्थिति में मानसिक बेचैनी, अकारण चिन्ता, भय, कल्पित शारीरिक रोग आदि उत्पन्न हो जाते हैं।
1 | 2  >>  
संबंधित जानकारी खोजें
और भी
जगन्नाथ रथयात्रा : सौ यज्ञों के पुण्य बराबर
संस्कृति में पिता का महत्व
क्या विरोधाभासिक है हिंदू धर्म?
हिंदुत्व: धर्म या जीवन पद्धति
आचार्य तुलसी- महान अवदानों के प्रदाता
विकास का रास्ता स्वयं बनाएँ