- प्रो. महावीर सरन जैन नाभिकीय शस्त्र-मुक्त और हिंसारहित संसार की निर्मिति के लिए यह आवश्यक है कि संसार के सभी देश सैनिक कार्यों पर किए जाने वाले विशाल, अन्धाधुंध, अनुत्पादक एवं निरर्थक व्यय में पर्याप्त कमी करें। जब महाशक्तियों में एक-दूसरे के विरुद्ध या तीसरे देशों के विरुद्ध नाभिकीय और परम्परागत सभी प्रकार के युद्धों का परित्याग करने, बाह्य अन्तरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने, नाभिकीय शस्त्र-परीक्षणों को बन्द करने, रासायनिक शस्त्रों पर प्रतिबन्ध एवं उन्हें पूरी तरह नष्ट करने तथा सैन्य-क्षमताओं को नियंत्रित करने आदि विचारों के प्रति रजामंदी बढ़ रही है तब ऐसी स्थिति में यह परमावश्यक है कि सभी देश अपने सैन्य बजटों में पर्याप्त कटौती करें।अर्थशास्त्रियों ने सैनिक व्यय का बेरोजगारी तथा मुद्रास्फीति के साथ सह-सम्बन्ध का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है। संसाधनों को युद्ध सामग्री एवं शस्त्र उत्पादन के उच्च प्राविधिक क्षेत्रों की ओर मोड़े जाने से विश्व में बेरोजगारी एवं मुद्रास्फीति बढ़ती है। निजी उद्योग अस्त्र-शस्त्रों के विक्रय में भारी मुनाफा कमाते हैं। वे रक्षा-अनुबन्धों में जिस प्रकार दिलचस्पी लेते हैं वह सर्वविदित है। सैनिक उत्पादन में की गई पूँजी-निवेश की अपेक्षा असैनिक उत्पादन में की गई पूँजी-निवेश से काफी ज्यादा रोजगार मिलता है। शस्त्रों का उत्पादन करने वाले उद्योग अपने निजी स्वार्थों के लिए 'शीतयुद्ध' का वातावरण बनाते तथा विकसित करते हैं, शस्त्रों की होड़ का मनोविज्ञान बनाने में उत्प्रेरक का काम करते हैं तथा हथियारों को खरीदवाने के लिए विकासशील एवं अविकसित देशों को कर्जदार बनवा देते हैं। विकासशील देशों पर विदेशी ऋणों के बढ़ते हुए बोझ एवं उनकी ऋणग्रस्तता की समस्याओं का सबसे बड़ा कारण यही है। विश्व में कुल वार्षिक सैन्य-व्यय इतना अधिक है कि इस धनराशि के पचास प्रतिशत भाग को खाद्य पदार्थों एवं उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में तथा अविकसित एवं विकासशील देशों को दी जाने वाली अनुदान-निधि में विनियोजित एवं हस्तांतरित करने से पूरे विश्व की भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी दूर हो सकती है। इस समय जो अनुसंधान हो रहे हैं उनको बन्द करने की आवश्यकता नहीं है, उनके प्रयोग-क्षेत्रों को बदलने की जरूरत है। नाभिकीय अनुसंधानों को अभी सैनिक कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन अनुसंधानों का विनियोग ऊर्जा की समस्या के समाधान के लिए किया जा सकता है। इसी प्रकार जीव-रसायन शास्त्र के क्षेत्र में जो अनुसंधान हो रहे हैं उनका प्रयोग विध्वंस-सामग्री एवं युद्ध सामग्री के उत्पादन के स्थान पर स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए किया जा सकता है। आज के विश्व के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का प्रभावकारी ढंग से मुकाबला करने के लिए देशों की गतिविधियों में समरसता स्थापित करने के लिए और बहुपक्षीयवाद की अवधारणा को सुदृढ़ करने के लिए यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र संघ और अधिक मजबूत बने, विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों की कार्यपद्धति और अधिक कारगर बने। निरस्त्रीकरण, देशों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समाधान, प्रत्येक देश को आधुनिक वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी ज्ञान का लाभ, संयुक्त राष्ट्र सशस्त्र सेना एवं संयुक्त राष्ट्र आपातिक सेना की शक्ति में अभिवृद्धि तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के अभिकरणों के संसाधनों में वृद्धि आदि क्षेत्रों में सभी देशों द्वारा तत्काल कदम उठाया जाना आवश्यक है जिससे इस संस्था की क्षमता में वृद्धि हो सके तथा इसके प्रति देशों की आस्था बढ़ सके। अविकसित एवं विकासशील देशों के औद्योगिक विकास के लिए 'यूएनडीपी' को इन देशों को नव्यतम तकनीकी, वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी सम्बन्धी जानकारी एवं विशेषज्ञ सुलभ कराने के लिए, खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) को इन देशों की खाद्य समस्याओं का हल निकालने के लिए तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयूएचओ) एवं 'संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल-आपातिक निधि' (यूनिसेफ) को इन देशों में प्राथमिक स्वास्थ्य, बुनियादी पोषक आहार तथा पेयजल प्रदान करने के लिए विशेष एवं सघन कार्यक्रम चलाने होंगे। (क्रमश:) |