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विश्‍व में हो सद्भावना का विकास-3
अहिंसा मूलक, धर्म-दर्शन एवं सद्भावना
- प्रो. महावीर सरन जै

dharm darshan
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अंतरराष्ट्रीय सद्भावना के संवर्धन के लिए सभी देशों को मानवीय विकास एवं प्रगति को केवल राष्ट्रीय दृष्टि से न देखकर पूर्णतः मानवीय और आधारभूत अनिवार्यता की दृष्टि से देखना होगा, मौजूदा असमानताओं को दूर करने की दिशा में सहयोगी बनना होगा और संसार में सभी जगह मनुष्य की जिन्दगी तथा विकास की दर को बेहतर बनाने में सहायता करनी होगी। इसी रास्ते शान्ति, न्याय, समानता और विकास पर आधारित नई विश्व-व्यवस्था स्थापित हो सकेगी, अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध लोकतांत्रिक बन सकेंगे तथा 'नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था' का विकास हो सकेगा।

समकालीन युग ने इस तथ्य को पहचाना है कि आर्थिक विषमता को समाप्त किए बिना समाज में सच्ची सुख-शान्ति स्थापित नहीं हो सकती। अंतरराष्ट्रीय सद्भावना के स्थायित्व के लिए विभिन्न देशों की आर्थिक असमानता और उनके असन्तुलन को मिटाना जरूरी है। औद्योगीकृत विकसित देशों तथा विकासशील एवं अविकसित देशों के जीवन-स्तर, प्रोद्यौगिकी स्तर एवं संसाधनों के स्तर के अन्तरालों को कम करने की आवश्यकता असंदिग्ध है। आज असन्तुलन की स्थिति यह है कि संसार की सैंतालीस प्रतिशत आबादी को विश्व के कुल संसाधनों में से केवल पाँच प्रतिशत ही प्राप्त है।

साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद तथा नव-उपनिवेशवाद की नीतियों के कारण आर्थिक दृष्टि से जो देश निर्धन हैं उनकी आर्थिक समस्याओं का तत्काल समाधान आवश्यक है। समाधान की आवश्यकता को अब व्यापक रूप में स्वीकार किया जा रहा है। समाधान की आवश्यकता की आलोचनात्मक विवेचना करने तथा समाधान के स्वरूप पर सैद्धान्तिक बहस करने का अवकाश नहीं है, इसको विद्वान एवं राजनयिक जिस नाम से चाहे पुकारें - सुधार, विकास संरचना, पुनः संरचना - इनमें से जो नाम देना चाहें, दें, विकसित देशों को इस दिशा में तात्कालिक एवं कारगर कदम उठाने होंगे। इन देशों को निम्नलिखित तथ्यों को हृदयंगम करना होगा-

(क) विश्व की दो-तिहाई आबादी के बराबर वाले इन देशों के समाजों में जो निर्धनता, निरक्षरता, भुखमरी, कुपोषण और रोगग्रस्तता है वह इनके ऊपर हुए औपनिवेशिक शोषण का परिणाम है।

(ख) यदि इन देशों के समाजों की स्थितियों को तत्काल नहीं सुधारा गया तो अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर आर्थिक असन्तुलन से उद्भूत तनाव तथा संघर्ष की स्थितियाँ उत्पन्न हो जाएँगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीति के प्रति जागरूकता बढ़ने तथा संचार के माध्यमों के विकास होने के कारण विकसित देशों के विकास प्रदर्शन तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों को देखे जाने का यह परिणाम हुआ है कि निर्धन देशों के समाजों के व्यक्तियों की आशाएँ एवं आकांक्षाएँ पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ गई हैं।
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