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विश्‍व में हो सद्भावना का विकास-2
अहिंसा मूलक, धर्म-दर्शन एवं सद्भावना
- प्रो. महावीर सरन जै

सन्‌ 1983 में संरा संघ की महासभा को सम्बोधित करते हुए भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने इस बात का उल्लेख किया था कि मौजूदा उथल-पुथल के बीच एक नई व्यवस्था जन्म लेने के लिए कसमसा रही है। उनके वाक्यों को उद्धृत करना ही समीचीन होगा- 'हम गुटनिरपेक्ष देशों के लिए और उन सबके लिए जो मानवता के भविष्य के प्रति गहरी चिन्ता रखते हैं, सवाल यह है कि हम इस नए सृजन के जन्म में सहायक बनें या उसके साँस लेने से पहले ही उसका गला घोंट दें?

यह मामला आसान नहीं है, क्योंकि इतिहास ने बार-बार यह दिखाया है कि विचारों और आन्दोलनों के रास्ते में कुछ देर के लिए तो रुकावटें खड़ी की जा सकती हैं लेकिन उन्हें हमेशा के लिए नहीं रोका जा सकता। समृद्ध-सम्पन्न कुछ लोग बहुत बड़ी जनसंख्या पर, दूसरों के प्राकृतिक संसाधनों पर और उनकी सांस्कृतिक शक्ति पर कब तक अपना प्रभाव डालते रहेंगे ? किसी विचारधारा के मानने वालों का गला घोंटकर, आप उस विचार का गला नहीं घोंट सकते। वह नवजात मरेगा नहीं। उसकी वृद्धि में विलम्ब किया जा सकता है लेकिन इसकी कीमत बहुत अधिक होगी और समृद्ध-सम्पन्न वर्ग को ही इसे भुगतना होगा।

जब शांतिपूर्ण परिवर्तन का मार्ग अवरुद्ध किया जाता है तो हिंसा जन्म लेती है। पहले किसी सभ्यता की समाप्ति के साथ विनाश और विध्वंस आता था। अगर हम पिछली प्रवृत्तियों के ही साथ चलें तो हम परिस्थितियों के चक्र में ही फँसे रह जाएँगे। लेकिन आज हमारे सामने अवसर हैं। बहुत सम्भव है कि मानव इतिहास में यह पहला अवसर हो जबकि मानव-जाति सचेत होकर पुराने से नए बदलाव का एक पुल बना सके, एक नए युग का निर्माण कर सके और एक-दूसरे के साथ कदम मिलाकर एक नए भविष्य की ओर अग्रसर हो सके।'

जिस प्रकार सामाजिक जीवन में सद्भावना के लिए यह आवश्यक है कि चिन्तन के धरातल पर उन्मुक्तता, अनाग्रह एवं सहिष्णुता के साथ-साथ संवेदना के धरातल पर एकता, पारस्परिक समझदारी, प्रेम एवं सहयोग की भावना विकसित हो उसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय सद्भावना के लिए सभी देशों में इस बात पर आम सहमति होनी चाहिए कि उनके बीच परस्पर सम्पर्क बढ़ना आवश्यक है, विचारों का आदान-प्रदान होना आवश्यक है। जब किसी देश का प्रतिनिधिमण्डल अथवा राष्ट्राध्यक्ष दूसरे देश की सद्भावना-यात्रा करता है तो परस्पर वार्ता एवं मिलन के कारण उन देशों के सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती है, सहयोग एवं सद्भावना बढ़ती है। राजनीतिज्ञों एवं राजनयिकों के अतिरिक्त देशों के सामान्य नागरिकों के बीच भी सम्पर्क बढ़ना चाहिए।

यह भी आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग की 'बहुपक्षीय व्यवस्था' के प्रति सभी देशों की आस्था बढ़े और प्रतिबद्धता सुदृढ़ हो। सर्वसामान्य की भलाई एवं कल्याण के लिए किए जाने वाले सहकारी कार्यों का दायरा बढ़ना चाहिए। आज पृथ्वीलोक में बहुत-सी जटिल समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं।

पर्यावरण, जनसंख्या वृद्धि तथा आबादी पर नियन्त्रण, जन-जन की निर्धनता समाप्त करने, रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा सभी लोगों की बुनियादी जरुरतों को पूरा करने आदि जैसे सार्वभौम चिन्ता के प्रश्नों का 'बहुपक्षीय व्यवस्था' के अन्तर्गत अंतरराष्ट्रीय सहयोग के अलावा अन्य किसी दूसरे उपाय से समाधान सम्भव नहीं हैं। इस दृष्टि से विकसित देशों को अपेक्षित उपाय करने के लिए, मानवीय कल्याणकारी एवं पृथ्वीलोक के पर्यावरण एवं परिवार-नियोजन सम्बन्धी प्रतिबद्धताओं को कार्यरूप देने के लिए सार्थक एवं सक्षम भूमिका का निर्वाह करना होगा। (क्रमश:)
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