मुख पृष्ठ > धर्म-संसार > धर्म-दर्शन > आलेख > विश्‍व में हो सद्भावना का विकास-1
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजिएयह पेज प्रिंट करें
 
विश्‍व में हो सद्भावना का विकास-1
सभी देशों में हो सद्भावना का विकास
- प्रो. महावीर सरन जै
dharm darshan
ND

विश्व शान्ति की सार्थकता एक नए विश्व के निर्माण में है जिसके लिए विश्व के सभी देशों में परस्पर सद्भावना का विकास आवश्यक है।
शांतिपूर्ण, सह-अस्तित्व एवं विकास के लिए घटकों द्वारा आग्रहपूर्ण नीति का त्याग तथा सहयोगपूर्ण नीति का वरण आवश्यक है। सह-अस्तित्व की परिपुष्टि के लिए आत्मतुल्यता एवं समभाव की विचारणा का पल्लवन आवश्यक है।

संसार के सभी देशों के नागरिकों में संसार के समस्त जीवों के प्रति मैत्रीभाव रखने तथा समस्त जीवों को समभाव से देखने की विचारधारा का पल्लवन आवश्यक है। इस मान्यता की स्वीकृति आवश्यक है कि किसी देश, धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्र में अन्य देश, धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्र की अपेक्षा कोई असाधारण विशेषताएँ नहीं होतीं। जाति और कुल से त्राण नहीं होता। प्राणी-मात्र आत्मतुल्य है। इस कारण प्रत्येक व्यक्ति को संसार के सभी प्राणियों को आत्मतुल्य मानना चाहिए, सबको आत्मतुल्य समझना चाहिए, सबके प्रति मैत्री भाव रखना चाहिए।

व्यक्ति के स्तर पर जिस प्रकार मैत्रीभाव एवं समभाव की स्वीकृति आवश्यक है उसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय सद्भावना के लिए पृथ्वीलोक के विभिन्न सामाजिक संवर्गों एवं राजनीतिक इकाइयों के बीच सद्भाव, समझदारी एवं सहयोग आवश्यक है। यह आवश्यक है कि सामाजिक धरातल पर आत्मतुल्यता एवं समता की भावना विकसित हो, राजनीतिक धरातल पर सभी देश परस्पर एक-दूसरे की स्वतन्त्रता तथा प्रभुसत्ता का आदर करें एवं एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करें तथा आर्थिक धरातल पर देशों के बीच व्याप्त आर्थिक असन्तुलन एवं वैमस्य समाप्त हो।

विभिन्न देशों के बीच सद्भावना के उदय के लिए 'पंचशील' के सिद्धान्तों की स्वीकृति एवं स्थिति आज भी प्रासंगिक है। वे हैं-
(1) एक-दूसरे देश की क्षेत्रीय अखण्डता तथा प्रभुसत्ता का सम्मान।
(2) परस्पर आक्रमण न करना।
(3) एक-दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
(4) समानता तथा परस्पर लाभ पहुँचाना।
(5) शांतिपूर्ण सहअस्तित्व।

जिस प्रकार सामाजिक जीवन में सद्भावना के विकास के लिए दूसरे व्यक्ति, धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्र आदि के प्रति सहिष्णुता की भावना आवश्यक है उसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय सद्भावना के लिए सभी देशों में इस बात पर आम सहमति होनी चाहिए कि हर देश को अपने रचनात्मक विकास का रास्ता स्वयं चुनने का अधिकार है। हर देश को यह अधिकार है कि वह अपने देश की जनता की आकांक्षाओं एवं इच्छाओं के अनुरूप अपने भविष्य के मार्ग का निर्धारण कर सके तथा उस रास्ते पर अपना सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास कर सके। (क्रमश:)
संबंधित जानकारी खोजें
और भी
सरलता ही मन की विशुद्धि...
वल्लभाचार्य चरण का प्राकट्य
धर्म और युद्ध बनाम धर्मयुद्ध
सर्वधर्म समभाव
धर्म-दर्शन एवं लोकतंत्र
परोपकार देता है अनोखी तृप्ति