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परोपकार देता है अनोखी तृप्ति
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जिसने समाज को सिर्फ दिया है, उससे कम लिया है, समाज उसका सदैव ऋणी रहता है और उसके मरने के बाद भी उसे याद करता है।
महापुरुष कहते रहे हैं कि जीवन एक 'व्यापार' है। सफल व्यापारी वह है जो लेन-देन का हिसाब बराबर रखता है और मुनाफा कमाने का प्रयत्न करता है। जीवन के व्यापार में लेन-देन और लाभ-हानि की बातें महत्वपूर्ण हैं। इन्हें सदैव ध्यान में रखना चाहिए। इसमें 'देने' को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए और 'लेने' को कम।

दरअसल जो व्यक्ति जितना अधिक देता है, वह उतना ही बड़ा धनवान समझा जाता है। कहते हैं कि जिसने समाज को सिर्फ दिया है, उससे कम लिया है, समाज उसका सदैव ऋणी रहता है और उसके मरने के बाद भी उसे याद करता है।

समाज में ऐसे अनेक त्यागी, संन्यासी और महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने मानव-सेवा और मानव कल्याण में अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने उसका बदला नहीं चाहा और अपार कष्ट सहकर भी अपना मार्ग नहीं छोड़ा। सच यह है कि ईश्वर करुणा सागर है। वह सभी के हृदय में मौजूद है। ईश कृपा से ही करुणा के भाव प्रकट होते हैं।

करुणा के भाव के कारण ही मनुष्य को दूसरे का दर्द गहराई से समझ में आता है और वह उसे दूर करने की कोशिश करता है। इसके बदले कितना कष्ट मिलेगा, वह इसकी चिंता नहीं करता। दरअसल दूसरे के कष्ट दूर कर वह अनोखी तृप्ति का अनुभव करता है। उसका सोच होता है कि परोपकार ही सबसे बड़ा धर्म है। यह नश्वर मानव-शरीर किसी के काम आए इससे बड़ा परोपकार क्या हो सकता है।

महर्षि दधीचि का दृष्टांत है। सभी जानते हैं कि उन्होंने इन्द्र के माँगने पर अपना शरीर-उसकी अस्थियों का दान दिया था, ताकि इन्द्र उससे अस्त्र-शस्त्र बनाकर राक्षसों से युद्ध लड़ें और उन्हें परास्त कर देव एवं मानव को सुखी बना सकें। यह देखकर सुखद अनुभूति होती है कि देहदान की वह परंपरा आज के समाज में भी मौजूद है। मानवसेवा में विश्वास करने वाले देहदान करते हैं।

यह कल्पना उन्हें बेहद संतोष देती है कि हाड़-माँस का यह शरीर किसी के काम आया, जीवन सफल हुआ। मरने के बाद शरीर को पंच-तत्वों में मिलना ही है, परंतु यदि इसके किसी अंग से किसी को नया जीवन मिलता है तो इससे बड़ा क्या परोपकार होगा। जीते-जी दूसरों की पीड़ा दूर करना और मरने के बाद भी दूसरों की पीड़ा दूर करना यह महापुरुषों के चिंतन का विषय होता है।

मदर टेरेसा जीवनभर पीड़ित मानव को सुखी बनाने में जुटी रहीं। सेवा करने में उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया। सबको अपना समझा, सबके के कष्ट मिटाती रहीं। उसके बदले कुछ नहीं चाहा इसलिए उनकी सेवा का ऋण समाज पर है। आज भी लोग उन्हें बड़े सम्मान से याद करते हैं।

परंतु जीवन के व्यापार में सभी लोग सकारात्मक सोच नहीं रखते। कुछ लोग समाज को जितना देते हैं, उससे अधिक लेने की इच्छा रखते हैं। कुछ लोग छिपकर और कुछ लोग प्रकट रूप में अपना स्वार्थ हल करते हैं। कुछ लोग इसके लिए चोरी, लूट-खसौट और जबरदस्ती भी करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे समाज की नजरों में गिरते हैं और अपना मान-सम्मान खोते हैं। जीवन के व्यापार में वे हानि उठाते हैं।

इसलिए न्याय की बात यह है कि यदि कुछ दिया तभी लेने की आशा करना चाहिए, वरना कष्ट उठाने को तैयार रहना चाहिए। समाज में बहुत से लोगों के कष्टों का कारण भी यही है कि वे पर्याप्त सुख-सुविधाएँ तो चाहते हैं, परंतु अपना कर्त्तव्य कर्म पूरी मेहनत और ईमानदारी से नहीं करते। वे यह भूल जाते हैं कि अच्छा फल पाने के लिए अच्छा बीज बोना पड़ता है।
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