- कुमुदिनी देशपांडे
ईश्वर-नाम की महिमा साक्षात ईश्वर से भी महान है। समर्थ रामदास स्वामी ने 'श्रीराम जय राम जय जय राम' इस त्रयोदशाक्षरी मंत्र के तेरह करोड़ जाप किए और उन्हें भगवान श्रीराम के साक्षात दर्शन हुए। ईश्वर-नाम की महिमा अपरंपार है। इस संदर्भ में एक बार महर्षि नारद ने भगवान श्रीराम के दरबार में सारे ऋषि-मुनियों के सामने यह विधान रखा कि भगवंत नाम साक्षात ईश्वर से भी महान है। दरबार में भगवान राम के गुरु व कुलगुरु विश्वामित्र एवं वशिष्ठ भी उपस्थित थे। उसी समय हनुमान राजसभा में उपस्थित हुए।
महर्षि नारद ने रामभक्त हनुमान को समीप बुलाकर कहा शिष्टाचार के नाते सर्वप्रथम तुम ऋषि-मुनि एवं श्रीराम को वंदन करो, लेकिन विश्वामित्र को वंदन मत करना। हनुमान ने विश्वामित्र को छोड़कर सभी को वंदन किया। यह देख विश्वामित्र क्रोधित हो उठे, वे तुरंत श्रीराम के पास पहुँचे और कहने लगे- राम तुम्हारे सेवक ने मुझे वंदन न करके मेरा अपमान किया है, जिसकी सजा तुम्हारे द्वारा कल सूर्यास्त से पहले उसे मृत्युदंड देकर होगी।
भगवान श्रीराम धर्मसंकट में पड़ गए। गुरु की आज्ञा वे तोड़ नहीं सकते, न ही वे हनुमान जैसे निष्ठावंत सेवक को अपने हाथों से मृत्युदंड दे सकते थे। | | ईश्वर-नाम की महिमा साक्षात ईश्वर से भी महान है। समर्थ रामदास स्वामी ने 'श्रीराम जय राम जय जय राम' इस त्रयोदशाक्षरी मंत्र के तेरह करोड़ जाप किए और उन्हें भगवान श्रीराम के साक्षात दर्शन हुए। ईश्वर-नाम की महिमा अपरंपार है। |
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दूसरे दिन हनुमान की कठोर परीक्षा देखने सभी जन सरयू नदी किनारे उपस्थित थे। श्रीराम स्वयं हनुमान की ओर करुण दृष्टि से देख रहे थे। वे धनुष-बाण उठाकर तीर पर तीर छोड़ने लगे, हनुमान आँखें बंद कर राम नाम जपते रहे, लेकिन एक भी तीर हनुमान को नहीं लगा।
संध्याकाल तक श्रीराम तीर चलाते रहे, लेकिन हनुमान तक एक भी तीर नहीं पहुँचा। तब महर्षि नारद विश्वामित्र से बोले- मुनिश्रेष्ठ कृपा कर आप शांत हो जाइए। श्रीरामचन्द्र का एक भी तीर हनुमान तक नहीं पहुँचा है। राम नाम की महिमा देखिए। साक्षात ईश्वर से भी बढ़कर नाम की महिमा है। हम सबमें राम विद्यमान हैं। वे ही हमें सद्बुद्धि देते हैं और कर्तव्य करने की शक्ति भी। हमें ही अपने राम को पहचानकर अपने कर्तव्यदक्ष होने का परिचय देना होगा।
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