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आया गेहूँ के जवारों को पूजने का पर्व !
- डॉ. ओपी जोशी

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कृषि प्रधान देश होने के कारण हमारे कई त्योहार कृषि से जुड़े हैं एवं गणगौर उनमें प्रमुख है। गणगौर पूरी तरह से गेहूँ से जुड़ा हुआ त्योहार है। गेहूँ अनाजों की प्रमुख फसल है। गणगौर का पर्व भी उस समय आता है, जब गेहूँ की फसल तैयार होकर कटाई के बाद खलिहानों से किसान के घर आ जाती है।

मोहन जोदड़ो की खुदाई में गेहूँ के दानों का पाया जाना यह दर्शाता है कि यह फसल काफी प्राचीन है। दुनियाभर गेहूँ की 18 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। भारत में भी पाँच प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की गई है जिसमें ट्रीटीकम-एस्टीवम प्रमुख है। यह ग्रेमीनी कुल का सदस्य है जिसका नया नाम पोएसी दिया गया है।

गेहूँ भारत की दूसरी प्रमुख फसल है, जो रबी के अंतर्गत आती है। वैसे तो गेहूँ का पूरा पौधा ही उपयोगी है। पत्तियाँ एवं तना एक ओर जहाँ चारे के रूप में उपयोगी है तो वहीं दूसरी ओर दानों से आटा, मैदा व सूजी तैयार किए जाते हैं। गणगौर पर गेहूँ के जवारों की पूजा की जाती है, जो वास्तव में अंकुरण से तैयार छोटे-छोटे पौधे होते हैं। अतः गणगौर पर जवारों का पूजन गेहूँ का अंकुरण-परीक्षण भी है, क्योंकि प्राचीन समय में किसान कुछ बीज बचाकर अगली फसल के लिए भी सुरक्षित रखते थे।

जवारे तैयार करने की क्रिया यह स्पष्ट कर देती होगी कि उन्हें आगामी फसल हेतु रखा जाए या नहीं। वर्तमान विज्ञान विशेषकर आहार एवं चिकित्सा में तो गेहूँ के जवारों को संजीवनी कहा गया है, क्योंकि इनसे प्राप्त रस का नियमानुसार सही उपयोग आरोग्यता प्रदान करता है।
  कृषि प्रधान देश होने के कारण हमारे कई त्योहार कृषि से जुड़े हैं एवं गणगौर उनमें प्रमुख है। गणगौर पूरी तरह से गेहूँ से जुड़ा हुआ त्योहार है। गेहूँ अनाजों की प्रमुख फसल है। गणगौर का पर्व भी उस समय आता है।      


जवारों के रस में पोषणदायक एवं रोग निवारक तत्व पाए जाते हैं। रस के रोग निवारण में बहुआयामी उपयोग के कारण इसे 'हरा रक्त' (ग्रीन ब्लड) तक कहा गया है। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने जवारे के रस एवं रक्त का पीएच मान भी बराबरी का देखा है, जो लगभग 7.4 का होता है। रक्त से उपस्थित हीमोग्लोबिन एवं जवारे के रस से उपस्थित क्लोरोफिल की रासायनिक रचना भी काफी कुछ समानता लिए होती है।

हीमोग्लोबिन की रासायनिक संरचना के केंद्र में लोहा पाया जाता है, जबकि क्लोरोफिल में मैग्नीशियम। दिल्ली में डॉ. विग्मोर का चिकित्सालय पिछले कई वर्षों से जवारे के रस से ही उपचार में कार्यरत है। गणगौर पर जवारों के पूजन के साथ-साथ गेहूँ के आटे से बने गहनों से सजाया भी जाता है। इन गहनों में पायल, बिछिया, कंगन, कंदोरा, हार, अँगूठी एवं कुंडल आदि प्रमुख हैं।

चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेज्युएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन एंड रिसर्च के वैज्ञानिकों ने कुछ वर्ष पूर्व पाया था कि जवारों का रस थेलेसीमिया रोग के इलाज में भी काफी कारगर है। इसके नियमित उपयोग से रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा 25 प्रतिशत तक बढ़ने का आकलन किया गया था। अन्न को देवता मानने वाले हमारे देश में निश्चित ही गणगौर गेहूँ पूजन का पर्व है।
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