' प्रवीण भावसार
ज्ञानी मनुष्य के मन में किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं होता यानी वह निर्रहंकारी होता है और यह गुण बहुत बड़ा होता है। ज्ञानी व्यक्ति अपने कर्म को सतत करता रहता है और उसमें उसे अहंकार नहीं होता। 'मैंने यह कर्म किया या मेरी वजह से यह कार्य पूर्ण हुआ' ऐसा उसे कभी मन में खयाल नहीं आता है।
हवा जैसे चारों ओर घूमती है, सूर्य जैसा उगता है, वेद जैसे बातें करते हैं, गंगा नदी जैसे निःस्वार्थ बहती है, उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति का व्यवहार होता है। मौसम के अनुसार पेड़ों पर फल लगते हैं, मगर स्वयं पेड़ यह नहीं जानता। वह फलों का अहंकार न करके फल दूसरों को बाँट देता है।
जिस प्रकार माला का एक फंदा-खोल दिया तो सारे मोती बिखर जाते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति के मन से, कर्म से, बातचीत से अहंकार बाहर निकल जाता है। आसमान में बादल उससे चिपककर नहीं रहते, उसी प्रकार शरीर द्वारा किए गए कर्म का अभिमान ज्ञानी व्यक्ति नहीं करते हैं। | | ज्ञानी मनुष्य के मन में किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं होता यानी वह निर्रहंकारी होता है और यह गुण बहुत बड़ा होता है। ज्ञानी व्यक्ति अपने कर्म को सतत करता रहता है और उसमें उसे अहंकार नहीं होता। 'मैंने यह कर्म किया या मेरी वजह से यह कार्य पूर्ण हुआ।' |
| |
शराबी व्यक्ति को जिस तरह अपने कपड़ों की याद नहीं रहती या फिर किसी तस्वीर के हाथों में हथियार व्यर्थ रहता है या किसी गधे की पीठ पर रखी शास्त्रों की किताबें ढोने से गधे में कोई अहसास नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष में, मैं देहधारी हूँ या मुझे कोई बीमारी है, इसकी याद नहीं रहती। वह सब कुछ भूलकर अपने कर्म में लगा रहता है।
इसी गुण को निर्रहंकारता कहते हैं। यह जहाँ होती है, वहाँ ज्ञान होता है। परंतु जो सच्चा ज्ञानी है, उसे अपने कर्म का अहंकार नहीं होता। यहाँ तक कि मैं स्वयं कार्य कर रहा हूँ, इसकी भी जानकारी नहीं होती। वह अपने ज्ञानार्जन में ही डूबा रहता है और वह दुष्कर्म, पाप, बुराई से दूर रहता है। वही सच्चा ज्ञानी कहलाता है।
|