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मुश्किलों के पहाड़ हटाती है आस्था...
- गरिमा तिवारी
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आस्था सचमुच वह सबसे महान चमत्कारी शक्ति है जिसकी कल्पना की जा सकती है। आस्था कभी किसी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती। हम तब असफल होते हैं जब हम अपनी आस्था का दामन छोड़ देते हैं।

बहरहाल, हम आस्था की अवस्थाओं को छोड़ देते हैं तो अंतिम परिणाम से हमें निराशा ही होगी। आस्था एक बीज की तरह है। अगर बीज को बोया न जाए तो इसमें फल लग ही नहीं सकते, परंतु बीज बोना सिर्फ पहली अवस्था है जब तक बीज को पानी न दिया जाए, तब तक इसमें अंकुर नहीं फूटेंगे। अंकुर फूटना दूसरी अवस्था है।

एक बार जब बीज बो दिया जाए और इसमें पानी दिया जाए तो विकास शुरू होता है परंतु जब तक पौधे को पोषण न दिया जाए तब तक पूर्ण परिपक्वता तक नहीं पहुँच पाएगा, यह विकसित नहीं हो पाएगा जो तीसरी अवस्था है। इसके बाद जब कलियाँ आकार लेने लगें, परंतु अगर जलवायु की स्थितियाँ ठीक न हों तो तने में कोई फल नहीं लगेगा, फल धारण करना इस चक्र की चौथी अवस्था है।
  आस्था सचमुच वह सबसे महान चमत्कारी शक्ति है जिसकी कल्पना की जा सकती है। आस्था कभी किसी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती। हम तब असफल होते हैं जब हम अपनी आस्था का दामन छोड़ देते हैं।      


जब हर अवस्था को उचित रूप से पोषण दिया जाए तभी बीज पूर्ण परिपक्वता तक पहुँच सकता है। अंतिम अवस्था में जब फल पक जाए तो बिलकुल सही समय पर फसल काटना पड़ती है। वरना हवाएँ, बारिश या अधिक पकने से फल जमीन पर गिर सकता है, यहाँ यह सड़ जाएगा। जिस तरह फल लगने की पाँच अवस्थाएँ होती हैं बीज बोने से लेकर उसकी फसल काटने तक की पाँच अवस्थाएँ होती हैं। उसी तरह पहाड़ हिलाने वाली आस्था के पूर्ण चक्र की भी पाँच अवस्थाएँ होती हैं।

आस्था की एक अवस्था होती है घोंसले की अवस्था। इस अवस्था में मस्तिष्क में एक विचार टपकता है, ठीक उसी तरह जिस तरह किसी चिड़िया के घोंसले में अंडा टपकता है। अगर इस अंडे को सेया नहींजाए तो वह घोंसले में ही सड़ जाता है ठीक ऐसे ही जैसे विचार मस्तिष्क से होकर गुजरता तो है परंतु उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता। कोई और चीज आस्था की संभावित व चमत्कारी शक्ति को इतनी ज्यादा खत्म नहीं करती जितनी कि आत्मविश्वास का अभाव। इस असुरक्षा या आत्मविश्वास के अभाव का कारण कुछ हद तक यह है कि हम एक नकारात्मक आत्मछवि विकसित कर लेते हैं, जो जीवन की सीढ़ी पर हमारे निचले स्थान पर आधारित होती है।

आस्था तब शुरू होती है, जब आप उन विचारों में विश्वास करना शुरू कर देते हैं जिन्हें ईश्वर आपके पास भेजता है। महानता जीवन में आपकी स्थिति पर निर्भर नहीं करती बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि आप उन सकारात्मक विचारों का कितना सम्मान करते हैं, जो आपकी कल्पना में प्रवाहित होते हैं।

सच तो यह है कि सीढ़ी की सबसे निचली पायदान पर खड़े औसत आदमी में भी विचारों के सम्मान करने के फलस्वरूप रचनात्मकता की उतनी ही संभावना है जितनी कि बड़े ऑफिस में बैठने वाले वरिष्ठ पदाधिकारी में।
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