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पूजा-भक्ति का प्रमुख अंग तिलक
पूजा और भक्ति का एक प्रमुख अंग तिलक है। भारतीय संस्कृति में पूजा-अर्चना, संस्कार विधि, मंगल कार्य, यात्रा गमन, शुभ कार्यों के प्रारंभ में माथे पर तिलक लगाकर उसे अक्षत से विभूषित किया जाता है।

उत्तर भारत में आज भी तिलक-आरती के साथ आदर सत्कार-स्वागत कर तिलक लगाया जाता है। तिलक मस्तक पर दोनों भौंहों के बीच नासिका के ऊपर प्रारंभिक स्थल पर लगाए जाते हैं जो हमारे चिंतन-मनन का स्थान है- यह चेतन-अवचेतन अवस्था में भी जागृत एवं सक्रिय रहता है, इसे आज्ञा-चक्र भी कहते हैं। इसी चक्र के एक ओर दाईं ओर अजिमा नाड़ी होती है तथा दूसरी ओर वर्णा नाड़ी है।

इन दोनों के संगम बिंदु पर स्थित चक्र को निर्मल, विवेकशील, ऊर्जावान, जागृत रखने के साथ ही तनावमुक्त रहने हेतु ही तिलक लगाया जाता है। इस बिंदु पर यदि सौभाग्यसूचक द्रव्य जैसे चंदन, केशर, कुमकुम आदि का तिलक लगाने से सात्विक एवं तेजपूर्ण होकर आत्मविश्वास में अभूतपूर्ण वृद्धि होती है, मन में निर्मलता, शांति एवं संयम में वृद्धि होती है।
  पूजा और भक्ति का एक प्रमुख अंग तिलक है। भारतीय संस्कृति में पूजा-अर्चना, मंगल कार्य, यात्रा गमन, शुभ कार्यों के प्रारंभ में माथे पर तिलक लगाकर उसे अक्षत से विभूषित किया जाता है। उत्तर भारत में आज भी तिलक-आरती के साथ आदर सत्कार तिलक लगाया जाता है।      


सन्‌ 1988 में प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. रन्डोल्फ व्यारड ने अपने अध्ययन द्वारा एक कम्प्यूटर के माध्यम से सेन फ्रांसिस्को के जनरल अस्पताल के लगभग 400 दिल के मरीजों के स्वास्थ्य सुधार के लिए भक्ति एवं प्रार्थना की जिससे उन मरीजों की बीमारी में आश्चर्यजनक लाभ हुआ और शेष मरीज जिनके लिए प्रार्थना नहीं की गई थी उन्हीं कठिन परिस्थितियों में रहे। कई प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रार्थना करने वाले के पवित्र विचार, सहानुभूति, करुणा एवं प्रार्थना किए जाने वाले के प्रति चिंतित रहना उसके स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है।

हारवर्ड मेडिकल स्कूल में डॉ. हर्बट बेनसन ऐसे प्रथम अनुसंधानकर्ता थे जिन्होंने भक्ति, प्रार्थना एवं ध्यान से तनावमुक्ति एवं स्वास्थ्य लाभ के संबंध में अध्ययन किया। उनके निष्कर्षों के अनुसार विभिन्न धर्मों की प्रार्थना, पूजा पद्धति से एक समान स्वास्थ्यवर्धक परिवर्तन होते है, इसे उन्होंने 'विश्राम अनुक्रिया' का नाम दिया।
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