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आस्था पर विवेक का नियंत्रण
- जगदीश ज्वलंत
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किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान की विलक्षणताओं से अभिभूत होकर अंतः का श्रद्धावनत होना आस्था है। श्रद्धा एक आंतरिक भाव है। जिज्ञासाओं का प्रारंभ आस्था से ही होता है। मानस-मन की जटिलताएँ किसी केंद्र बिंदु को तलाशती हैं।

आस्था ही वह केंद्र बिंदु है, जहाँ से इन जटिलताओं को सुलझाने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। आस्था से विश्वास बढ़ता है और विश्वास से समर्पण। किंतु इन तीनों आस्था, विश्वास और समर्पण पर विवेक का नियंत्रण आवश्यक है। विवेक का ईंधन ज्ञान है। ज्ञान से विवेक को ऊर्जा मिलती है, दिशा मिलती है, दृढ़ता मिलती है। अज्ञानी लोग सदैव आस्था के प्रश्न पर असमंजस की स्थिति में होते हैं, सही निर्णय नहीं ले पाते। ज्ञान के अभाव में विवेक कार्य नहीं करता और वे आस्थावानों की एक अंध-भीड़ का अंग बनकर किंवदंतियों की कश्ती पर चढ़कर स्वयं को भविष्य के भँवर में डाल देते हैं।

भविष्य सदैव अनिश्चित होता है। ज्ञानी लोग ज्ञान के सहारे भविष्य का आधार तैयार करते हैं, जबकि इसके ठीक विपरीत अज्ञानी लोग भाग्य का सहारा लेते हैं। अज्ञानियों के मस्तिष्क में भाग्यवादिता अपना घर बना लेती है और धीरे-धीरे दीमक की भाँति वह सोचने-समझने, उचित-अनुचित का निर्णय लेने की शक्ति को चट कर डालती है। ऐसे में व्यक्ति अंदर से स्वयं को एकाकी महसूसता है, वह टूटने लगता है। ऐसे में वह उन लोगों का मार्ग अपना लेता है जो उसी की मनःस्थिति में जी रहे होते हैं।
आस्था, विश्वास और समर्पण पर विवेक का नियंत्रण आवश्यक है। विवेक का ईंधन ज्ञान है। ज्ञान से विवेक को ऊर्जा मिलती है, दिशा मिलती है, दृढ़ता मिलती है। अज्ञानी लोग सदैव आस्था के प्रश्न पर असमंजस की स्थिति में होते हैं, सही निर्णय नहीं ले पाते।


वह उसी दिशा में चलने लगता है, जिधर चमत्कारिक, धूर्त, पूर्णतः व्यवसायी, ओझा-तांत्रिक, भविष्य वक्ता, मुल्ला-पंडित हैं, जो बगुलों की भाँति एक पैर पर खड़े ध्यान लगाए मछलियाँ तलाशते रहते हैं। उन्हें पता है कि ये अज्ञानी पूर्णतः विवेकहीन हैं।

इनसे किस प्रकार अपना हित-साधन किया जा सकता है। कुछ वैज्ञानिक प्रयोगों को चमत्कार का नाम देकर मनोवैज्ञानिक रूप से उनकी कमजोर नब्ज को छूकर वे आस्था जगाते हैं। ये प्रारंभिक प्रयोग होते हैं, जिनसे भीड़ पर नियंत्रण करके स्वयं के पक्ष में उपयोग-उपभोग किया जाता है।

आस्था की आँखें नहीं होतीं, वह दिल से नजरों का काम लेती है। समर्पण में वह सर्वस्व न्योछावर करने के भाव रखती है। आस्थाएँ अज्ञानता के क्षेत्र में तेजी से संक्रमित होती हैं। आस्थाओं की उर्वरा भूमि मिलते ही विश्वास तेजी से जड़ें जमा लेता है। जड़ें इतनी गहरी हो जाती हैं कि भूले से भी विवेक और ज्ञान की खरपतवार उधर फटक ही नहीं पाती। वट-वृक्ष के नीचे कभी कुछ नहीं उगता।

जिसकी घनी टहनियों पर झाड़-फूँक के गिद्ध, टोने-टोटके के चील, ताबीजों के उल्लू ही बसेरा करते हैं। हमें चाहिए कि हम आस्थाओं की दिशा पर विवेकसम्मत निर्णय लेकर बढ़ें। प्राप्ति के लिए आस्था का होना आवश्यक है। किंतु प्राप्ति की दिशा और आस्था के प्रतीकों का चयन करने के लिए सोच को विस्तार देना आवश्यक है। ज्ञान की कसौटी और विवेक के तराजू पर आस्था को तौलना आज की आवश्यकता है।
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