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दीप तुम जलते रहना
- डॉ. पुष्पारानी गर्ग

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अँधेरे का श्रृंगार करने वाला यह दीपक प्रकाश की आराधना है, संघर्ष की साधना है, सतत जलते रहने का संकल्प है।

दीपावली दीपोत्सव का पर्व है। भगवती लक्ष्मी की पूजा का पर्व होने पर भी इसे दीप का पर्व माना गया है। यूँ महालक्ष्मी की पूजा भी बिना दीपक के पूर्ण नहीं होती। कांति, शोभा, संपन्नता, श्री, सौंदर्य, ये महालक्ष्मी के गुण हैं। ये दीपक के भी लक्षण हैं। शायद इसीलिए लक्ष्मी पूजन के मंगल अवसर पर दीपावलियाँ सँजोई जाती हैं और इस पर्व को 'दीपावली का त्योहार' कहते हैं।

इस पर्व पर अमावसी रात्रि के गहन अंधकार में पंक्तिबद्ध जलते हुए दीपों की शिखाएँ मद्धिम लय पर अभिनव नर्तन करके जिस सौंदर्य की सृष्टि करती हैं, वह अपने आप में अनूठा है। दीपावली के पर्व पर दीप शिखाओं का जगमग करता प्रकाश नेत्रों को तृप्त करता हुआ आत्मा की गहराइयों तक उतर जाता है। इसके अनुपम सौंदर्य का नेत्र भर पान करने के लिए इस दिन अवश्य ही देवगण भी स्वर्ग से धरती पर उतर आते होंगे और प्रकाश के इस रुपहले सागर में स्नान करके अभिभूत हो जाते होंगे।

दीपक अपनी शिखा ज्योति से ऐश्वर्य का सृजन कर माँ महालक्ष्मी को भी आकर्षित करता है, क्योंकि दो समानधर्मा तत्वों में सहज आकर्षण होता है। ऋग्वेद के 'श्री सूक्त' में यज्ञ में प्रज्वलित अग्नि से यह प्रार्थना की गई है कि हे अग्ने, आप मेरे लिए उस मनपगामिनी लक्ष्मी को बुलाओ... 'ताऽम आवह जातवेदो लक्ष्मी मनपगामिनीम्‌...' विचार करने की बात यह है कि देवी महालक्ष्मी का प्राकट्य जल से हुआ है, फिर वेद का ऋषि उसके आह्वान के लिए अग्नि से क्यों प्रार्थना कर रहा है? शायद इसलिए कि यज्ञ की अग्नि में आकर्षण है, सौंदर्य है, तरल ऊष्मा है, पावन प्रकाश है, ऐश्वर्य है, जो कि महालक्ष्मी के ही गुण हैं, जिनके कारण उसे 'ईश्वरी' कहकर संबोधित किया गया है।
दीपावली दीपोत्सव का पर्व है। भगवती लक्ष्मी की पूजा का पर्व होने पर भी इसे दीप का पर्व माना गया है। यूँ महालक्ष्मी की पूजा भी बिना दीपक के पूर्ण नहीं होती। कांति, शोभा, संपन्नता, श्री, सौंदर्य, ये महालक्ष्मी के गुण हैं। ये दीपक के भी लक्षण हैं।


यह अग्नि जब नन्हे से दीपक की लौ में सिमट आती है तो लगता है कि वह स्वयं ऋचा गान कर रही है। तब एक आनंदमयी मृदुल ऊष्मा से तन-मन ही नहीं, संपूर्ण वातावरण आप्लावित सा हो उठता है। ऐसे समय में सौंदर्य की जगमगाती लिपि में माँ लक्ष्मी की आराधना के श्लोक रचने वाला दीपक स्वयं भी वंदनीय हो उठता है। तब अंधकार में ज्योति की आस्था जगाने वाला यह दीपक स्वयं शिवत्व की सौंदर्यमयी लिपि, आकर्षण का मंत्र बन जाता है।

अँधेरे का श्रृंगार करने वाला यह दीपक प्रकाश की आराधना है, संघर्ष की साधना है, सतत जलते रहने का संकल्प है, निष्काम कर्म का उद्घोष है, अस्तित्व की आस्था का आलोकमय संगीत है, मोह निशा की निद्रा से जाग उठने का आह्वान है। अँधेरे में जगमग करता दीपक स्वयं उपमेय भी है, उपमान भी है। अपने प्रकाश से स्वर्णिम आभामंडल की रचना करने वाली दीपक की लौ एक विशिष्ट अलौकिक सौंदर्य की सृष्टि करती है। इसीलिए संत तुलसीदास जनक सुता सीता के सौंदर्य के वर्णन के लिए दीप शिखा की उपमा देते हैं- 'सुंदरता कहँ सुंदर करई,छविगृह दीप शिखा जनु बरई।'
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