भगवान राम के अवतरण के पूर्व भी राज्य तंत्र था और राजा प्रजापालन भी करते थे, किंतु वे प्रजा की उनके किसी कार्य की क्या प्रतिक्रिया होगी, इसका कदाचित ही चिंतन करते थे। भगवान राम ने प्रजा की इच्छानुकूल राज्य व्यवस्था की थी। वनगमन के समय जब अनुज लक्ष्मणजी साथ चलने का जोरदार आग्रह करने लगे, तब प्रजातंत्र का अनन्यतम सूत्र प्रकट करते हुए श्रीराम कहते हैं, 'हे भाई! तुम यहीं (अयोध्या में) रहो और सबका परितोष करो। अन्यथा बहुत दोष लगेगा। जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है... |