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श्रद्धया यत्‌ क्रियते तत्‌
-पूज्य पांडुरंग शास्त्री आठवल
भाद्रपद महीने के कृष्णपक्ष के पंद्रह दिन, श्राद्धपक्ष अथवा महालय पक्ष कहलाते हैं। ये दिन पूर्वजों और ऋषि-मुनियों के स्मरण-तर्पण के दिन माने जाते हैं। श्राद्ध यानी 'श्रद्धया यत्‌ क्रियते तत्‌।' श्रद्धा से जो अंजलि दी जाती है, उसे श्राद्ध कहते हैं।

जिन पितरों ने और पूर्वजों ने हमारे कल्याण के लिए कठोर परिश्रम किया, रक्त का पानी किया, उन सबका श्रद्धा से स्मरण करना चाहिए और वे जिस योनि में हों, उस योनि में उन्हें दुःख न हो, सुख और शांति प्राप्त हो, इसलिए पिंडदान और तर्पण करना चाहिए।

तर्पण करने का अर्थ है तृप्त करना, संतुष्ट करना। जिन विचारों को संतुष्ट करने के लिए, जिस धर्म और संस्कृति के लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया हो, उन विचारों, धर्म और संस्कृति को टिकाए रखने का हम प्रयत्न करें, तो वे जरूर तृप्त होंगे।

रोज देव, पितर तथा ऋषियों की तृप्ति रहे ऐसा जीवन जीना चाहिए और वर्ष में एक दिन जिन पितरों को, ऋषि को हमने माना हो उनके श्राद्ध निमित्त हमारे जीवन का आत्मपरीक्षण करना चाहिए। हम कितने आगे बढ़े और कहाँ भूले थे, उसका तटस्थ बनकर विचार करना चाहिए।

श्राद्ध परंपरा को टिकाता है, सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखता है। निसर्ग जिसे शरीर से ले जाता है, उसको श्राद्धमय स्मरण अमर बनाता है। काल ने जिनका नाश किया, परन्तु कर्मों और विचारों ने जिन्हें चिरंजीव बनाया है, ऐसे धर्मवीरों और कर्मवीरों का कृतज्ञ भाव से पूजन करके इन दिनों में कृतकृत्य होना चाहिए।

मानव जीवन विविध ऋणमुक्ति के लिए है। हम पर देवों और ऋषियों का ऋण है। इन निःस्वार्थी कर्मयोगियों के ऋण से मुक्त होने के लिए हमें क्या-क्या करना चाहिए, इसका इन पंद्रह दिनों में विचार करना होता है।

श्राद्ध के दिवस अर्थात्‌ ऋषितर्पण के दिवस। भारतीय संस्कृति की महानता, भव्यता, दिव्यता इन ऋषियों की अभारी है। भारत की आज भी विश्व में जो मान्यता है उसका कारण हमारे पूर्वज हैं।

स्वयं जलकर लोगों के जीवन प्रकाशित किए, इसलिए समाज उनका ऋणि है। ऋषियों का ऋण अदा करने के लिए उनके विचारों का प्रचार करना चाहिए, उनकी संस्कृति टिकाने का उसका प्रचार करने का प्रयत्न करना चाहिए।
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