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पूर्वोत्तर भारत के छठ महोत्सव में शुक्रवार को खरना कार्यक्रम में महिलाओं ने दिन भर निर्जल व्रत रखा। पूजा स्थल पर मिट्टी तथा ईंट के चूल्हे बनाकर मिट्टी के पात्र में गुड़ और चावल की खीर और रोटी बनाई गई। इसके बाद हवन-पूजन के बाद केले के पत्ते पर भोजन किया गया।

शनिवार को महिलाएँ निर्जल उपवास रखकर शाम को नदी अथवा कुंड में खड़े होकर बाँस के सूप में ठेकुआ, मौसमी फल तथा अन्य प्रसाद सामग्री रखकर डूबते सूरज को अर्घ्य देंगी। रात भर भजन-कीर्तन के बाद रविवार सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ महोत्सव का समापन होगा। इसके बाद श्रद्धालु अदरक व गुड़ से उपवास खोलेंगे।

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भगवान भास्कर की आराधना :- छठ के दिन सूर्य-पूजन तथा पंचगव्य प्राशन का विशेष महत्व है। इस व्रत की पूजन सामग्री में कनेर के लाल पुष्प, गुलाल, दीप तथा लाल वस्त्र विशेष फलदायक है। ऐसी मान्यता है कि सूर्य भगवान की आराधना से नेत्र रोग तथा कई प्रकार के चर्म रोग दूर हो जाते हैं। इस दिन व्रत करने वाले को नमक नहीं खाना चाहिए। लाल चंदन अथवा केसर से सूर्यनारायण की प्रतिमा बनाकर वैदिक मंत्रों से गंध, पुष्प और अक्षत से मूर्ति में भगवान भास्कर का आह्वान कर पूजा करनी चाहिए।

सूर्य-आराधना की थी कुंती ने :- महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य उपासना की गई थी। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं। अतः इन्हें प्रसन्न करने तथा जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण अवयवों जल एवं सूर्य के महत्व को दर्शाने के लिए छठ पर्व मनाया जाता है। कई पुरुष भी इस पूजन में शरीक होते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जो लोग मन्नत माँगते हैं तथा जिनकी मन्नत पूरी हो जाती है वे छठ पूजा में लोट लगाते हुए आते हैं।

छठ पर्व के इस अवसर पर भक्ति गीतों का गायन किया जाता है।

- छठी मइया घटिया कादो कीचड़, केहू देओ न बहार....

- छठी मइया घटिया कदम गछिया....

- गंगाजी के झिलमिल पनिया नइया खेवेला मझधार.....

- उगे के उगलीं सूरजमल, काहे गइनी भितराय.....

- केरवा जे फरेला घवद से ओपर सुगा मेरराए....
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