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- विक्रांत पाठ
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भाई दूज पर बहनों ने भाइयों को जी भर कर कोसा और गालियाँ दीं। यहाँ तक की उन्होंने भाइयों को मर जाने का श्राप भी दिया। इसके बाद प्रायश्चित करते हुए बहनों ने अपनी जीभ पर काँटे चुभाए। भाई दूज मनाने की यह अनोखी परंपरा उत्तर भारत में है। रायगढ़ में निवासरत उत्तर भारतीय परिवारों ने इसी परंपरा से भाई दूज का पर्व मनाया।

हमारे देश की संस्कृति और परंपरा काफी समृद्घ और विविधता लिए हुए है। एक ही त्योहार को लोग अलग-अलग परंपरा से मनाते हैं। भाई दूज के इस पर्व पर यहाँ अलग-अलग मोहल्लों में रहने वाले उत्तरप्रदेश, बिहार व झारखंड के मूल निवासियों ने अपनी पंरपराओं से यह त्योहार मनाया। उन्होंने आंगन में गोबर से चौकोर आकृति बनाई। उसके अंदर यम और यमी की गोबर से ही बनी प्रतिमा रखी।
इसके अलावा सांप, बिच्छु आदि की आकृति भी बनाई गई थी। बहनों ने सामूहिक रूप से उसकी पूजा की।

पूजा के दौरान ही उन्होंने अपने भाइयों को कोसा और श्राप दिया। श्राप देने के बाद अपने जीभ पर काँटा चुभाकर उसका प्रायश्चित भी किया। इसके बाद उस आकृति के अंदर चना, ईंट, नारियल गरी, सुपारी, काँटा रखकर उसे कूटा गया। इसे गोधन कूटना कहा जाता है। पूजन के बाद बहनों ने भाइयों को तिलक लगाकर उन्हें प्रसाद खिलाया।

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इसके पीछे यह मान्यता है कि यम द्वितीया के दिन भाइयों को गालियाँ व श्राप देने से उन्हें यम (मृत्यु) का भय नहीं रहता। शाकंबरी ने इस परंपरा की मान्यता के बारे में बताया कि राजा पृथु के पुत्र की शादी थी। उसने अपनी विवाहिता पुत्री को भी बुलाया। दोनों भाई बहन में खूब स्नेह था।

जब बहन भाई की शादी में शामिल होने आ रही थी, तो रास्ते में उसने एक कुम्हार दंपति को बातें करते सुना। वे कह रहे थे कि राजा कि बेटी ने अपने भाई को कभी गाली नहीं दी है। वह बारात के दिन मर जाएगा। यह सुनते ही बहन अपने भाई को कोसते हुए घर गई।

बारात निकलते वक्त रास्ते में साँप, बिच्छु जो भी बाधा आती उसे मारते हुए अपने आंचल में डालते गई। वह घर लौटी तो वहाँ यमराज पहुँच गए। यमराज भाई के प्रति बहन के स्नेह को देखकर प्रसन्न हुए और कहा कि यम द्वितीया के दिन बहन अपने भाई को गाली व श्राप दे, तो भाई को मृत्यु का भय नहीं रहेगा। भाई दूज पर उत्तर भारतीयों की यह परंपरा सचमुच अनोखी है।
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