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शीतलाष्टमी व्रत कथा
शीतलाष्टमी व्रत का फल

इस व्रत को करने से व्रती के कुल में दाह ज्वर, पीत ज्वर, विस्फोटक दुर्गंधयुक्त फोड़े, समस्त नेत्र रोग, शीतला की फुंसियों के चिह्न और शीतलाजनित सर्वरोग दूर होते हैं।

इस व्रत के करने से शीतला माता सदैव संतुष्ट रहती हैं।

शीतला माता का स्वरू

शीतला स्तोत्र में शीतला का जो स्वरूप बताया गया है, वह शीतला के रोगी के लिए अत्यंत हितकारी है-

वन्देऽहं शीतलां देवीं रासमस्थां दिगम्बराम्‌।
मार्जनीकलशोवेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्‌

अर्थात शीतला दिगम्बरा हैं, गर्दभ पर आरूढ़ रहती हैं। सूप (छाज), झाडू और नीम के पत्तों से अलंकृत होती हैं तथा हाथ में शीतल जल का कलश रखती हैं।

शीतला के रोगी क्या न करे

इस रोग का प्रकोप जिस घर में होता है, वहाँ अन्नादि की सफाई व झाड़ू लगाना वर्जित है।

रोगी को गरम वस्तुओं तथा खाद्य पदार्थों से दूर रखें।

रोगी को तले खाद्य पदार्थ न दें।

रोगी को नमक भी नहीं देना चाहिए।

शीतला रोग का उपाय
वास्तव में शीतला के रोगी की देह में दाहयुक्त फोड़े हो जाते हैं, जिसके कारण उसे नग्नप्राय रहना पड़ता है। गधे की लीद की गंध से फोड़ों की पीड़ा में आराम मिलता है।

सूप व झाड़ू रोगी के सिरहाने रखते हैं।

नीम के पत्तों के कारण रोगी के फोड़े में सड़न पैदा नहीं होती।

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