मुख्य पृष्ठ > धर्म-संसार > व्रत-त्योहार > अन्य त्योहार
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
निराशा को दूर करता वसंत
- अखिलेश श्रीराम बिल्लौरे
WD

आया वसंत, खुशहाली लाया। हमारे-आपके मन को झंकृत करने चला। उसकी आहट प्रफुल्लित करती है मन को। मन चंचल है, सुकून ढूँढता है... और यह सुकून उसे वसंत देता है। वसंत उत्सव अमर आशावाद का प्रतीक होता है। वसंत को चाहने वाला, उसकी पूजा करने वाला अपने जीवन में कभी उदास नहीं होता। जिस प्रकार पतझड़ में वृक्ष के पत्ते झर जाते हैं, उसी प्रकार वह अपने जीवन से निराशा को निकाल फेंकता है।

निराशायुक्त जीवन में वसंत आशा की किरण बनकर आता है। यही वसंत की किरण उसके जीवन को आनंदमय बना देती है। हमें अस्वस्थता का आभास हो तो प्रकृति के सान्निध्य में जाना चाहिए। वसंत के मौसम में प्रकृति की छटा अद्‍भुत होती है। चारों ओर खुशहाली नजर आती है। रंग-बिरंगे फूल हमारे स्वागत में पलक-पावड़े बिछाए हमारी राह को कोमल बनाते हैं।

प्रकृति हमें शांति, आनंद प्रदान करती है। निरोग बनाकर हमें कांतियुक्त भी बना देती है। बशर्ते हम उसकी सच्ची आराधना करें। वह हमारी सारी निराशा, चिंता से हमें मुक्त कर देगी। प्रकृति अपने वासंती रंगों से हमारे जीवन में रंग-उल्लास भर देगी। फिर देखिए, आशा की पंखुडि़याँ हमारे मन में खिल उठेगी।

जीवन में सुख-दु:ख, आशा-निराशा यात्री की तरह हैं। यह तो हमारा मन है जो सुख में तो आनंद का अनुभव करता है और दु:ख में प्रिय से बिछड़े हुए पथिक की तरह पतझड़ में सुकून ढूँढने की नाकाम कोशिश करता है। होना तो यह चाहिए कि दु:ख में निराश होने के बजाए उसका स्वागत करना चाहिए। उसी में आनंद की खोज करना चाहिए। पतझड़ जाने के बाद नई कोंपले अवश्य फूटती हैं।
  वसंत प्रेरणा देता है, प्रसन्नता प्रदान करता है। वह अपने रंगों से हमारे जीवन में रंग भरता है। किसान की मेहनत का फल देता है। बागों में तरह-तरह के फूल वसंत के आगमन के प्रतीक हैं। वसंत में ऐसा लगता है मानो धरती ने सतरंगी चादर ओढ़ ली हो।      


इसलिए प्रकृति की शरण में जाना चाहिए। प्रकृति की सुंदरता और यौवन की रसिकता का जहाँ सुमेल होता है, वहाँ निराशा, नीरसता, निष्क्रियता जैसी बातों का स्थान कहाँ होगा? हम भी अपने जीवन में नई कोंपलों का इंतजार करें, उनकी अगवानी की तैयारी करें। फिर उनका स्वागत करें।

वर्तमान में ‍भविष्य का अभिवादन करें। हमारा जीवन वसंतमय बनाएँ। फिर देखिए, कैसे न हमारे जीवन में खुशियाँ न आतीं। वसंत को श्रद्धा से, प्रसन्नता से आत्मसात करें तो जरूर हमें मंजिल मिलेगी। किसी ने शायद सही ही कहा है- 'बीती ताहि बिसार दे, अब आगे की सोच।'

निष्क्रियता को जीवन में कभी स्थान न दें। हमें कर्मशील बनना चाहिए। गीता भी यही संदेश देती है। प्रकृति क्रियाशील के साथ रहती है। प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करें, उसका अनुसरण करें। फल की चिंता किए बिना किया गया कर्म मन को शांति प्रदान करता है। बाहरी दिखावा नहीं अंदर से कर्म को प्रज्वलित करें।

कोई भी कार्य कठिन नहीं होता। निराश मन सरल कार्य को भी कठिन बना देता है। इसके विपरीत दृढ़ निश्चय, साहस, धर्ममय श्रद्धा से किया गया कर्म कठिन कार्य को भी सरल बनाने की क्षमता रखता है। निश्चय ही ऐसा कर्म सफलता दिलाता है।

वसंत प्रेरणा देता है, प्रसन्नता प्रदान करता है। वह अपने रंगों से हमारे जीवन में रंग भरता है। किसान की मेहनत का फल देता है। बागों में तरह-तरह के फूल वसंत के आगमन के प्रतीक हैं। धरती जिस प्रकार वर्षाकाल में हरी चादर धारण करती है उसी प्रकार वसंत में ऐसा लगता है मानो धरती ने सतरंगी चादर ओढ़ ली हो। पीली सरसों के खेत मन को सूर्य के प्रकाश की तरह प्रकाशवान बनाते हैं। इस प्रकार प्रकृति हमारे जीवन को प्रकाशित कर देती है।
और भी
सरस्वती पूजन व प्रार्थना
ऋतुराज
रंगता कौन बसंत?
बासंती बसंत की
तुलसीदास और वसंत ऋतु
कवियों की दृष्टि में वसंत