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तुलसीदास और वसंत ऋतु
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रामचरित मानस के अरण्यकाण्ड में महाकवि तुलसीदास ने दोहा क्रमांक 36 एवं 37 क व ख में विभिन्न चौपाइयों के माध्यम से वसंत ऋतु का अति उत्तम वर्णन किया है।

दोहा-
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि

चौपाई-
चले राम त्यागा बन सोऊ ।
अतुलित बल नर केहरि दोऊ ॥

बिरही इव प्रभु करत बिषादा ।
कहत कथा अनेक संबादा ॥

लछिमन देखु बिपिन कहि सोभा ।
देखत केहि कर मन नहिं छोभा ॥

नारि सहित सब खग मृग बृंदा ।
मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा ॥

हमहि देखि मृग निकर पराहीं ।
मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं ॥

तुम्ह आनंद करहु मृग जाए ।
कंचन मृग खोजन ए आए ॥

संग लाइ करिनीं करि लेहीं ।
मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं ॥

सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ।
भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ ॥

राखिअ नारि जदपि उर माहीं ।
जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं ॥

देहु तात बसंत सुहावा ।
प्रिया हीन मोहि भय उपजावा ॥
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