-जगदीश जोशी गीता के उपदेश की सार्थकता इसी में थी कि अर्जुन युद्ध करने के लिए तैयार हो जाए। वह पूरे मनोयोग से युद्ध करने के लिए न केवल तत्पर ही हुआ अपितु महाभारत युद्ध के विजेता का गौरव भी प्राप्त कर सका।
उस समय केवल एक अर्जुन था, परन्तु आज की परिस्थिति में प्रत्येक भारतवासी को अर्जुन बनना पड़ेगा तभी भगवान श्रीकृष्ण की आराधना एवं गीता का अध्ययन-मनन सार्थक हो सकेगा।
महाभारत काल में वैदिक ज्ञान-विज्ञान प्रायः लुप्त हो चुका था और तात्कालीन सामाजिक व्यवस्था लड़खड़ा गई थी। इनके स्थान पर आत्मा के सच्चे स्वरूप के विषय में सामाजिक कर्तव्य के विषय में उस युग के तत्ववादियों के विभिन्न मतों का एक जंजाल ही दिखाई देने लगा था, उदाहरणार्थ प्रज्ञावाद, नियतिवाद, भूतवाद,स्वभाववाद, यदृच्छावाद, सद्सद्वाद, योनिवाद आदि चिन्तनधाराएँ उस काल में जन्म ले चुकी थीं, परिणामतः समाज लड़खड़ा रहा था और मतिभ्रम उत्पन्न हो गया था।
| यदि अर्जुन युद्ध से पलायन कर जाता तो क्या स्थिति बनती?। द्रौपदियों की लाज सरेआम नीलाम होती दिखाई देती। आज हर एक क ओ अर्जुन बनना होगा। |
| |
जैसा कि वर्तमान में वैदिक ज्ञान के अभाव में अनेक मत, पंथ, संप्रदायों ने समाज को छिन्न-भिन्न और मृतप्राय बना रखा है। तात्पर्य यह है कि वैचारिक क्षेत्र में वर्तमान का परिदृश्य महाभारत काल के परिदृश्य से काफी कुछ मिलता-जुलता है।
इन सभी मत-वादों के कारण उस काल में समाज विभिन्न वर्गों में विभाजित तो हो ही चुका था अपितु अकर्मण्यता भी बढ़ती जा रही थी। उस काल की विभिन्न विचारधाराओं में कुछ धाराएँ उन ज्ञानमार्गियों की थीं, जो कर्म को त्याज्य व बन्धन का कारण मानते थे।
आज भी हमें इस स्थिति के दर्शन होते हैं। समाज टुकड़ों में विभाजित है और समाज, संस्कृति और देश हित के प्रति उदासीन अकर्मण्यों की जमात बड़ी संख्या में दिखाई दे रही है।
मान लीजिए, यदि अर्जुन युद्ध से पलायन कर जाता तो क्या स्थिति बनती? स्पष्ट है दुर्बुद्धि दुर्योधन जैसे स्वार्थी, अनाचारी और अधर्मियों की जमात बढ़ जाती और भीष्म, द्रोणाचार्य जैसे व्यक्ति उनकी हाँ में हाँ मिलाते दिखाई देते। द्रौपदियों की लाज सरेआम नीलाम होती दिखाई देती। अन्याय और हठधर्मिता का सर्वत्र साम्राज्य हो जाता। सोचिए और अपने अन्तःकरण में विश्लेषण कीजिए कि अर्जुन का युद्ध करना कितना उचित था?
|