-श्रीदत्तात्रय बालकृष्ण कालेलकर एक का एक ही नया सूरज रोज-रोज उगता है, फिर हर रोज नया प्राण, चैतन्य, नवजीवन अपने साथ ले आता है। यह सोचकर कि सूरज पुराना ही है, पक्षी निरुत्साह नहीं होते। कल का ही सूर्य आज आया है। यह कहकर द्विजगुण भगवान दिनकर का निरादर नहीं करते।
जिस आदमी का जीवन शुष्क हो गया है, जिसकी आँखों का पानी उतर गया है, जिसकी नसों में कुछ नहीं रहा है, उसी के लिए सूरज पुराना है। जिसमें प्राण का कुछ भी अंश है, उसके मन तो भगवान सूर्य नारायण नित्य-नूतन हैं।
जन्माष्टमी भी हर साल आती है प्रतिवर्ष वही की वही कथा सुनते हैं, उसी तरह उपवास करते हैं और प्रायः एक ही ढंग से श्रीकृष्ण जन्म उत्सव मनाते हैं, फिर भी हजारों वर्षों से जन्माष्टमी हमें उस जगद्गुरु का नया ही सन्देश देती आई है। कृष्णपक्ष की अष्टमी के वक्रचंद्र की तरह एक पगपर भार देकर और दूसरा पैर तिरछा रखकर शरीर की कमनीय बांकी अदा के साथ मुरलीधर ने जिस दिन संसार में प्रथम प्राण फूंका, उस दिन से आज तक हर एक निराधार मनुष्य को यह आश्वासन मिला है कि
नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।
भाई! जो आदमी सन्मार्ग पर चलता है, जो धर्म पर डटा रहता है उसकी किसी भी काल में दुर्गति नहीं होती।
लोग खयाल करते हैं कि धर्म दुर्बल लोगों के लिए है। अधिक हुआ तो व्यक्तियों के आपसी संबंध में उसकी कुछ उपयोगिता होगी। पर राजा और सम्राट तो जो करे, वही धर्म है। साम्राज्यशक्ति धर्म से परे है। व्यक्ति का पुण्य क्षय होता होगा। पर साम्राज्य तो अलौकिक वस्तु है। ईश्वर की विभूति से साम्राज्य की विभूति श्रेष्ठतर है। सम्राट जब हाथ में विजय पताका लेकर पर्यटन करता है तो ईश्वर दिन में चंद्रमा की भांति कहीं छिप रहता है।
मथुरा में कंस की भावना ऐसी ही थी, मगध देश में जरासन्ध का ऐसा ही खयाल था, चेदि देश में शिशुपाल की यही मनोदशा थी, जलाशय में रहने वाला कालियानाग यही मानता था, द्वारका पर चढ़ाई करने वाले कालयवन की यही फिलासफी थी, महापापी नरकासुर को यही शिक्षा मिली थी और दिल्ली का सम्राट कौरवेश्वर भी इसी वृत्ति में पलकर बड़ा हुआ था। ये तमाम महापराक्रमी राजा अन्धे या अज्ञानी थे।
उनके दरबार में इतिहासवेत्ता, अर्थशास्त्र विशारद और राजधुरन्धर अनेक विद्वान थे। वे अपने शास्त्रों का मन्थन करके उनका नवनीत निकालते और अपने सम्राटों के सामने रखते थे, परन्तु जरासन्ध कहता-' आपके ऐतिहासिक सिद्धांतों को रहने दीजिए, मेरा पुरुषार्थ अपने बुद्धिबल और बाहुबल से आपके इन सिद्धांतों को मिथ्या सिद्ध करने में समर्थ है।'
| जन्माष्टमी हर साल आती है, प्रायः एक ही ढंग से श्रीकृष्ण जन्म उत्सव मनाते हैं, फिर भी हजारों वर्षों से जन्माष्टमी हमें उस जगद्गुरु का नया ही सन्देश देती आई है। |
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कालयवन कहता-' मैं एक ही अर्थशास्त्र जानता हूं, दूसरे देशों को लूटकर उनका धन छीन लेना। यही धनवान बनने का एकमात्र आसान, सीधा और इसी कारण सशास्त्र मार्ग है।' शिशुपाल कहता- 'न्याय अन्याय की बात प्रजा के आपसी कलह में चल सकती है। हम तो सम्राट ठहरे। हमारी जाति ही जुदा है। प्रतिष्ठा और पद ही हमारा धर्म है।' कौरवेश्वर कहता-' जितने रत्न हैं, सब हमारी विरासत हैं, वे हमारे ही पास आने चाहिए।' 'यतो रत्नभुजो वयम्-' ( क्योंकि हम रत्नभोगी हैं, रत्न का उपभोग करने के लिए पैदा किए गए हैं)।
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