-पूज्य पांडुरंग शास्त्री आठवले आषाढ़ की पूर्णिमा अर्थात व्यास पूजा का दिवस। व्यास पूजा के पवित्र दिन संस्कृति के निर्माताओं का पूजन होता है। संस्कृति निर्माण का कार्य अलग-अलग ढंग से अनेक ऋषियों ने किया है। परंतु वेदव्यास ने सभी विचारों का संकलन करके हमारी संस्कृति को ज्ञानकोष रूप 'महाभारत' ग्रंथ दिया। 'भारतः पंचमो वेद' उनके इस ग्रंथ को पाँचवें वेद की उपमा प्राप्त हुई।
महाभारत द्वारा उन्होंने संस्कृति के विचारों को उदाहरण सहित सरल भाषा में समाज के समक्ष रखा। 'मुनिनामप्यहम् व्यासः' ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी प्रशंसा की है। वेदव्यास के जीवन और कवन को अमर बनाने के लिए उनके अनुगामी चिंतकों ने संस्कृति के विचारों का प्रचार करने वाले सभी को 'व्यास' के संबोधन से पुरस्कृत करना निश्चित किया।
संस्कृति के विचार जिस 'पीठ' पर से प्रवाहित होते हैं उस पीठ को आज भी 'व्यासपीठ' कहते हैं। इस व्यासपीठ पर आसीन होकर जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से अपनी उपासना को भक्ति समझकर स्वकर्तव्य रूप से संस्कृति के प्रचार का जीवनव्रत लेता है, उसकी इस दिन पूजा करके कृतकृत्य होना चाहिए।
व्यास को ही हम हिन्दू धर्म के पिता मान सकते हैं। व्यक्ति का मोक्ष और समाज का उद्धार इन दोनों आदर्शों को अभेद बुद्धि से देखने वाले, अभ्युदय और निःश्रेयस का समन्वय साधने वाले और अध्यात्म-परायण व्यास से बढ़कर कोई समाजशास्त्री नहीं हुआ है। उनका वैदिक और लौकिक ज्ञान इतना अमयाद था कि सर्वज्ञ लोगोंने कृतज्ञतापूर्वक कहा है कि 'व्यासोच्छिष्टं जगत् सर्वम्' और व्यागिरा महाभारत को 'सारं विश्वस्य' कहा है।
महर्षि व्यास जीवन के सच्चे भविष्यकार हैं। कारण यह है कि उन्होंने जीवन को उसके समग्र स्वरूप में जाना है। जीवन न तो केवल प्रकाश है और न केवल अंधकार! जीवन तो है प्रकाश-छाया की आँख-मिचौनी, ज्वार-भाटा का खेल और सुख-दुःख का समन्वय। महर्षि व्यास का कहना है कि हमारा जीवन तो काले और सफेद तंतुओं से बना हुआ वस्त्र है। सद्गुण और दुर्गुण जीवन में साथ ही देखने को मिलते हैं।
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