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॥ भगवान महावीर का निर्वाण दिवस ॥
Mahavir
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- डॉ. मनस्वी श्री विद्यालंका

(आओ लड्डुओं का दिव्य प्रसाद वितरित करें)
कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन ही स्वाति नक्षत्र में केवल्य ज्ञान प्राप्त करके भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया था। जैन धर्म में धन लक्ष्मी, राज्य लक्ष्मी, यश लक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी व ज्ञान लक्ष्मी की बजाय वैराग्य लक्ष्मी की प्राप्ति पर बल दिया गया है।

प्रत्येक जीव पुनः जन्म पुनः भरण के दुःखों को जानता है, उसका विचार भी करता है, इस पुनः पुनः जन्म एवं पुनः पुनः मरण से स्वयं को मुक्त कर ले, किंतु लोभ, मोह, माया और क्रोध इन चारों महादोष के रहते उसका निर्वाण संभव नहीं है।

विश्व का मूल है कर्म, कर्म का मूल है 'कषाय' जो कर्मों के आदान, लोभ, माया और क्रोध का वमन, त्याग व निरोध करता है, वही स्वकृत कर्मों का भेत्ता अर्थात्‌ नाश करने वाला बनता है।

वास्तव में यदि देखा जाए तो इन सबके पीछे काम भावना ही कार्यरत है। काम से क्रोध उत्पन्न होता है। जो क्रोध दर्शी होता है वह मान दर्शी होता है आगे चलकर मान दशी सेमाया दर्शी से लोभ दर्शी लोभ दर्शी से द्वेष दर्शी, द्वेष दर्शी, गर्भ दर्शी से जन्म दर्शी, जन्म दर्शी से मृत्यु दर्शी, मृत्यु दर्शी से नरक दर्शी, नरक दर्शी से दुःख दर्शी होता है।

इस प्रकार सदैव जन्म सदैव मृत्यु का आवागमन करोड़ों जीवन पर्यंत चलता रहता है। इन सबसे मुक्त कैसे हों? जिस प्रकार कुशल वैद्य उदर में सायास अथवा अनायास पहुँचे विख को भी जड़ी-बूटी के प्रयोग से उतार देते हैं। इसी प्रकार सु-श्रावक अष्ट-कषायों को शीघ्र क्षय कर डालते हैं।

महावीर स्वामी ने संसार रूपी दावानल के ताप को शांत करने में जल के समान, मोहरूपी धन की गठरी को दूर करने में पवन (हवा) के समान, माया रूपी कठोर पर्वत को खोदने में पैने हल के समान, मार्दव रूपी वज्र के द्वारा माया रूपी पृथ्वी पर पड़े हुए गर्व रूपी पर्वत का भेदन करने हेतु भगवान महावीर ने उपदेश प्रसारत किए।

भगवान महावीर का स्वयं का जीवन ही उनके उपदेशों की एक खुली किताब है। उनके उपदेशों को जानने-समझने के लिए कोई विशेष चेष्टा की जरूरत नहीं।
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