- स्मृति जोशी पतंग के आकाश में पहुँचने का अर्थ होता है कि आप मैदान में आकर दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हैं। आपकी एक पतंग है और चारों तरफ से प्रतिद्वंद्वी आ जाते हैं। पतंग को चारों तरफ से घेरा जाता है। लेकिन पेच लड़ाने का साहस कोई एक पतंग करती है। यह कबड्डी का मैदान नहीं है कि किसी एक को छूकर आप अपने पाले में आ जाएँ। यह वह मैदान है, जहाँ करो या मरो की लड़ाई लड़नी होती है या तो आपकी पतंग कटेगी या उस अगले की जो आपसे उलझा है।
पतंगें, मुक्ताकाश में उड़ती, सरसराती, लहराती, इठलाती, सुंदर, सजीली पतंगें, कई-कई रंगों की आकर्षक पतंगें क्या आपको नहीं लुभाती? रंगीन कागज का यह नन्हा सलोना आविष्कार कुछ लोगों के लिए समय की बर्बादी हो सकता है, लेकिन आशा व विश्वास, आकांक्षा व संकल्प और प्रेम व स्वप्न की भावुक पतंग हर युग के हर मानव ने उड़ाई है, उड़ा रहा है। आज भी कितने ही लोग हमारे बीच ऐसे हैं जिनकी स्मृतियों के विराट समुद्र में इस एक पतंग के बहाने बहुत कुछ आलोड़ित होता है।
कितनी ही दुर्बल अंजुरियों में वह पतंगमयी अतीत आज भी थरथराता है। कइयों ने इसे अपनी मुट्ठी में कसकर भींच रखा है। बार-बार खुलती है मुट्ठी और एक मीठी याद शब्दों में बँधकर, कपोलों पर सजकर इसी पुराने आकाश पर ऊँचा उठने के लिए बेकल हो जाती है और जब किसी ने जानने के लिए हथेली पसारी तो कहाँ संभल सकी वे स्मृतियाँ? अँगुलियों की दरारों से फिसलने लगी! सच ही है कि स्मृतियों को समेटने के लिए दामन भी बड़ा होना चाहिए। | | पतंग के आकाश में पहुँचने का अर्थ होता है कि आप मैदान में आकर दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हैं। आपकी एक पतंग है और चारों तरफ से प्रतिद्वंद्वी आ जाते हैं। पतंग को चारों तरफ से घेरा जाता है। लेकिन पेच लड़ाने का साहस कोई एक पतंग करती है। |
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एक जोड़ी चमकती बूढ़ी आँखें, खुशी से फैल जाती हैं। फिर सिकुड़ती हैं, माथे पर 'त्रिपुंड-तिलक' बनता है और यकायक जैसे आत्मीयता से लबरेज एक खिलखिलाता मोहल्ला हमारे समक्ष आकर बैठ जाता है। वो आकाश जो हमारा अपना था, वो कच्ची खपरैल या टिन की छतें, वो खनकती उन्मुक्त बयार और गगनभेदी वह अनुगूँज 'काटा है'! पतंगें तो आज भी हैं, आवाजें भी गूँज रही हैं, फिर 'वो' क्या है जो हमारी एक खास पीढ़ी को लगता है कि खो गया है। कहाँ? किस जगह? कैसे? उन्हें भी नहीं पता, लेकिन बस शिकायत है कि 'वो' नहीं है अब, जो 'तब' था। किसे फुरसत कि ढूँढे 'उसे'। पर 'वे' कहाँ कहते हैं कि तुम 'ढूँढो'? वे तो स्वयं उस कल की मिठास को ढूँढकर तुम्हें भेंट देना चाहते हैं, पर उन्हें शिकायत है कि 'वह भी' करने की उनकी स्वतंत्रता हमने बाधित कर दी है।
परत-दर-परत उठती है और सबसे पहले पतंगों के नाम बिखरते हैं, 'सिरकटी, तिरंगी, चौकड़ी, परियल, डंडियल, कानभात, आँखभात, चाँद भात, गिलासिया, चुग्गी, ढग्गा' और भी न जाने कितने अनूठे नाम। फिर दूसरी परत के उठते ही किसी सँकरी-सी गली का वह दृश्य सामने आता है जहाँ डोर 'सूती' जा रही है। कोई फ्यूज बल्बों को फोड़कर काँच पीस रहा है, कोई सरस या नीला थोथा रंग के साथ घोल रहा है। घोल तैयार होते ही किसी के हाथों में 'रील' होती है धागे की और कोई उसे घोल में डुबोकर 'चकरी' में लपेट रहा है। इस चकरी को हुचका भी पुकारा जाता है।
बिजली के दो खंभों के बीच यह डोर सुखाई जाती है और फिर लपेट ली जाती है। यह संक्रांति की पूर्व संध्या है। जीते-जागते इस मोहल्ले से फिर जानकारी मिलती है, 'बरेली की डोर सबसे अच्छी होती है। वह पतली होती है, पर मजबूत होती है।'
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