सबके सामने वह कोई आता है कि निगाहों में चमक जाग उठती है। निगाहों की यह चमक बेशरम नहीं होती। लेकिन इसमें इतना साहस होता है कि वह दुनिया की अर्थपूर्ण दृष्टि का मुकाबला करती रहे। एक सप्ताह के इस आयोजन में पूरी जिंदगी की शर्तें, रिश्ते समेट लिए जाते हैं। हर रोज होने वाले भगोरिए में पूरे सप्ताह फिर उसी का इंतजार किया जाता रहता है।
दिन उसे देखने में तो रातें नाचने-गाने में गुजर जाती हैं। होली की मस्ती से ठीक एक सप्ताह पहले शुरू होने वाला, भीली संस्कृति को एक पहचान देने वाला भगोरिया दो भागों में बँटा होता है। एक भगोरिया मेला तो दूसरा भगोरिया त्योहार। एक का मूल स्वर अगर प्रेम पाने का प्रयास है तो दूसरे का स्वर आध्यात्मिकता में रच जाने का है। दोनों शुरू साथ-साथ होते हैं।
त्योहार तो उसी माह समाप्त हो जाते हैं लेकिन इन मेलों को जिसने आत्मसात कर लिया, वह फिर जन्म-जन्म तक उनसे बँधा रह जाता है। भगोरिया त्योहार प्रायः प्रौढ़ पुरुषों के नायकत्व का हिस्सा है। इसमें स्त्री की प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं होती। वहीं भगोरिया मेला बिना नायिका के पूरा नहीं होता। एक अगर वैराग्य का स्वांग है तो दूसरा प्यार की अधीरता को अर्पित है। भगोरिए को त्योहार के रूप में मनाने वाले इन दिनों में अपने बदन को हल्दी से लेप कर रखते हैं। बदन का ऊपरी हिस्सा खुला रहता है। सिर पर साफा बाँधा जाता है।
हाथ में नारियल व काँच रहता है। भोजन एक समय करते हैं, वह भी हाथ से बनाकर। जीवन संगिनी से दूर रहकर कुछ आवश्यक साधना पूरी करते हैं। होली के बाद ये लोग गल देवता की विधि-विधान से पूजा करते हैं, मन्नत उतारते हैं। इस समय गाँव के विशिष्ट लोग उपस्थित रहते हैं। गल देवता के मेले जुटते हैं।
मन्नतधारी व्यक्ति को गल देवता के ऊपर चढ़ाकर उसे हवा में गोल-गोल घुमाया जाता है। मन्नतें भी बड़ी विचित्र होती हैं, जैसे पानी अच्छा गिरे, फसलें अच्छी हों, परिवार के बीमार लोग ठीक हो जाएँ, कर्जा समाप्त हो जाए आदि। इस दरमियान शराब व मांस दोनों का सेवन नहीं किया जाता है।
मन्नतधारी व्यक्ति जमीन पर सोता है। जबकि मेले में शामिल होते हैं हजारों लोग। एक सप्ताह पहले से खुशबूदार साबुन, पावडर जैसी सौन्दर्य सामग्री खरीदने का क्रम शुरू हो जाता है। नए कपड़ों की खरीददारी की जाती है। फिर निगाहें खोजती हैं किसी अपने को। इसे आधुनिक प्रेम परिभाषा के जरिए नहीं समझा जा सकता। इसमें वादों का कोई स्थान नहीं। सौंदर्य का आकर्षण भी उतना महत्वपूर्ण नहीं है। दोनों के बीच पैसा कोई स्थान नहीं रखता। पत्थर पर खिल गए गुलाब की तरह भगोरिए का प्यार होता है। पत्थर दिलों पर भगोरिया प्रेम की लकीरें बनाता है। पत्थर की तरह ये निशान लंबी उम्र पाते हैं।
लोकगीतों की धुनों व परंपरागत वाद्यों, खासकर बाँसुरियों की धुन पर थिरकते लोगों की टोलियाँ जब पारम्परिक पोशाकों के साथ मेले में आती हैं तो मन होली की मस्ती से झूमने लगता है। भगोरिया प्राकृतिक आनंद का प्रतीक है जो जीवन के अभावों व उनसे उत्पन्न मायूसी पर विजय का उद्घोष करता है। अभावों पर आनंद का छींटा है। बाहरी दुनिया इसे आँखों को तसल्ली देने वाला रैंप मान लेती है।
भोली सुंदरता की नुमाइश समझ बैठती है। लेकिन भगोरिया न तो फैशन परेड का रैंप है और न ही जिस्म नुमाइश का अवसर। यह तो इंतजार की पराकाष्ठा पर प्राप्त स्वयं को गुनगुनाने वाला, मस्ती से भरा एक पल है- क्षण है जो जिंदगी से भी बड़ा होता है। इसे तभी समझा जा सकता है जब दुनियादारी की विकसित खोह से बाहर निकलकर आदि मानव की तरह प्रकृति के समीप जाकर स्वयं के जीवन को संगीत की तरह सुना जाए।
बाजारू व बिकाऊ प्रतीकों को छोड़कर पेड़ पर लगे एक ही फूल को जब दो अलग-अलग हाथ एक साथ छूते हैं, तब भगोरिए के मर्म को समझा जा सकता है। दिमाग के उस्ताद बनकर, पंडित-ज्ञानी बनकर भी भगोरिए को नहीं देखा जा सकेगा। पागल बनकर, दीवाना बनकर, दिमाग के निर्देशों से नाता तोड़कर दिल के निर्देश पर आँखों को खोलकर भगोरिया देखा जाता है। जो ऐसा कर सकते हैं उन्हें आमंत्रण है। वे आएँ 15 से 21 मार्च तक झाबुआ, धार, खरगोन में और मुस्कराते टेसू, गुनगुनाते लोकगीत, गूँजती बाँसुरी व थिरकते कदमों को अपने जीवनभर के गम सौंप दें।
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