हवाओं में जब गर्मी अपने तेवर दिखाने लगे, खुशबू का अहसास उसमें तैरने लगे, मादकता गीतों में जगह बनाने लगे, पत्थर तोड़ते हाथों के पोरों पर मेहँदी की उपस्थिति दर्ज होने लगे, ताड़ी महुआ में रस भरने लगे, टेसू खिलने लगे, वसंत यौवन पर आने लगे तो समझो भगोरिया आने वाला है। भीली संस्कृति का अपना त्योहार।
ऐसा पुरातन त्योहार जो हर दौर की नवीनता को अपनी तहजीब देता है। अपने अंदर का संदेश व ऊर्जा देता है। भगोरिया केवल मानव नहीं, प्रकृति भी अपने संकेतों के साथ मनाती है। यह त्योहार उन्हीं लोगों के लिए है जो हड्डियों की मजबूती की परीक्षा प्रत्येक दिन श्रम करके लेते हैं। जिनके हृदय में कोमलता की एक धारा तो बहती है, लेकिन उस पर कठोर जीवनशैली का कवच भी होता है।
इसे नारियल को प्रतीक बनाकर नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि नारियल की अंदरूनी धारा व ऊपर की कठोरता के बीच स्वाद की मोटी परत मौजूदगी रहती है। इसे भूमिगत जल की एक पतली धारा के माध्यम से समझा जाना चाहिए। इस पतली-सी गुमनाम अदृश्य धारा के ऊपर सैकड़ों फुट मोटी कोरी मिट्टी व ठोस चट्टानों का पहाड़ मौजूद रहता है। भगोरिया इस पतली-सी, कोमल धारा को धरती फोड़कर छूता है। | | हवाओं में जब गर्मी अपने तेवर दिखाने लगे, खुशबू का अहसास तैरने लगे, मादकता गीतों में जगह बनाने लगे, पत्थर तोड़ते हाथों के पोरों पर मेहँदी की उपस्थिति दर्ज होने लगे, ताड़ी महुआ में रस भरने लगे, टेसू खिलने लगे, वसंत यौवन पर आने लगे तो समझो भगोरिया आ गया। |
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इसमें पाने की जो खुशी होती है वह किसी मुराद, किसी दैविक प्रसाद से कम नहीं होती। भगोरिया में मिला प्रेम ठीक वैसा ही होता है जैसे भूमिगत जल को गंगा मैया का प्रसाद मानकर लोग घर-आँगन में विराजित कर लेते हैं। भगोरिया ढीढता का प्रतीक नहीं, बल्कि इसका प्रसाद या तो मन्नत करके पाया जाता है या पुरुषार्थ का परिचय देकर प्राप्त किया जाता है। हजारों लोगों की उन्माद जगाती भीड़ में अपनी चाहत पर हाथ रख देना स्वयं पर व अपनी चाहत के समर्पण पर, अपने पुरुषार्थ पर विश्वास की पराकाष्ठा के बिना संभव नहीं होता।
भगोरिया केवल एक अवसर भर नहीं होता है लूट-खसोट कर लेने का, एक जीवन की शुरुआत होता है, जिसका आधार प्रेम की वह बूँद होती है जो सदियों से बहा करती है। सुविधाओं की चाहत के बिना पूरी जिंदगी अभावों के हाथों सहर्ष सौंप देना। उफ्-आह-त्रास को नकारकर उस आनंद के एक क्षण में पूरा जीवन समेट देना भगोरिया है।
इतनी जीवंतता होती है भगोरिया में कि सूरज ने कब अपना सफर पूरा कर लिया, पता ही नहीं चलता। लोकगीत ऐसे कि शब्द रचना समझ में न आए, तब भी कान उनसे जुड़े रहें। चेहरों के भाव ऐसे कि कैमरे को राहत का अवसर ही न मिले। श्रंगार ऐसा कि उसमें प्राकृतिक सौंदर्य की विशेषता खोजने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़े।
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