चतुर्थी तिथि की श्रेष्ठता
साल भर के गणेश चतुर्थी व्रत-माहात्म्य एवं व्रत विधि
साश्रुनयना देवी ने परम प्रभु गजानन के पावनतम चरणों में प्रणाम कर निवेदन किया- 'करुणानिधे! आप मुझे अपनी सुदृढ़ भक्ति प्रदान करें। मुझे सृष्टि सर्जन की सामर्थ्य प्राप्त हो। मैं आपको सदा प्रिय रहूँ और मुझसे आपका कभी वियोग न हो।'
स्वीकृतिसूचक 'ओम्' का उच्चारण कर परम प्रभु ने वर प्रदान किया- 'चतुर्विध फल प्रदायिनी देवि! तुम मुझे सदा प्रिय रहोगी! तुम समस्त तिथियों की माता होओगी और तुम्हारा नाम 'चतुर्थी' होगा। तुम्हारा वामभाग 'कृष्ण' एवं दक्षिण भाग 'शुक्ल' होगा। निस्संदेह तुम मेरी जन्मतिथि होओगी। तुम्हारे में व्रत करने वाले का मैं विशेष रूप से पालन करूंगा और इस व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं होगा।'
यह कहकर भगवान गजमुख अन्तर्धान हो गए। तिथियों की माता चतुर्थी गणपति का ध्यान करते हुए सृष्टि रचना करने लगीं। सहसा उनका वामभाग कृष्ण और दक्षिण भाग शुक्ल हो गया। महाभाग्यवती शुक्लवर्णा अत्यंत विस्मित हुईं। उन्होंने पुनः गणाध्यक्ष का ध्यान करते हुए सृष्टि रचना का उपक्रम किया ही था कि उनके मुखारविन्द से प्रतिपदा तिथि उत्पन्न हो गई। इसी प्रकार नासिका से द्वितीया, वक्ष से तृतीया, अंगुली से पंचमी, हृदय से षष्ठी, नेत्र से सप्तमी, बाहु से अष्टमी, उदर से नवमी, कान से दशमी, कंठ से एकादशी, पैर से द्वादशी, स्तन से त्रयोदशी, अहंकार से चतुर्दशी और मन से पूर्णिमा तथा जिह्वा से अमावस्या तिथि प्रकट हुई।
सभी तिथियों सहित दोनों चतुर्थियों ने भगवान गजमुख के ध्यान और नाम जप के साथ तपश्चरण प्रारंभ किया। इस प्रकार उनके एक वर्ष तक तप करने पर भक्तवत्सल प्रभु विघ्नेश्वर प्रकट हुए। वे मध्याह्न में शुक्ल चतुर्थी के समीप पहुँचकर बोले- 'वर माँगो।'
शुक्ल चतुर्थी ने आदिदेव गजमुख के चरणों में प्रणाम कर उनकी पूजा और स्तुति की। तदनन्तर उन्होंने कहा- 'परमप्रभु गजमुख! मैं आपका वासस्थान होऊं और आप मुझे अपनी शाश्वती भक्ति प्रदान करें।'
दयामय गजमुख ने वर प्रदान किया- 'तुम्हें मध्याह्न काल में मेरा दर्शन प्राप्त हुआ है, अतएव मध्याह्न काल में शिवादि देवगण मेरा भजन करेंगे। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मेरे भक्तजन सदा तुम्हारा व्रत करेंगे। जो निराहार रहकर मेरे साथ तुम्हारी उपासना करेंगे, उनका संचित कर्म भोग समाप्त हो जाएगा और उन्हें मैं सब कुछ प्रदान करूंगा। तुम्हारा नाम 'वरदा' होगा।'
इतना कहकर श्री गणेश अन्तर्धान हो गए और भगवती शुक्ल चतुर्थी का 'वरदा' नाम प्रख्यात हुआ। वे श्री गणेश को अत्यंत प्रिय हुईं। उस दिन व्रत के साथ श्री गणेश की उपासना कर पंचमी को सविधि पारण करने से निश्चय ही मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं। व्रती की प्रत्येक कामना पूरी होती है और अन्त में वह अतिशय सुखदायक गणेश धाम को प्राप्त होती है।
इसके अनन्तर भगवान गणपति ने रात्रि के प्रथम प्रहर में चन्द्रमा के उदित होने पर कृष्ण चतुर्थी के समीप पहुँचकर कहा- 'महाभाग्यवती! तुम वर माँगो, मैं तुम्हारी अभिलाषा पूरी करूँगा।'