दीपावली के दिन लक्ष्मीजी की उपासना करना श्रेष्ठ माना गया है। हर घर में महालक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। लक्ष्मीजी को भगवान विष्णु की पत्नी माना जाता है। 'शतपथ ब्राह्मण' ग्रंथ में लक्ष्मीजी के बारे में एक कथा है कि प्रजापति ने लक्ष्मी की रचना की, लक्ष्मी का जन्म अत्यंत रूपवती और गुणवती देवी के रूप में हुआ। रूप और गुणों की अधिकता इतनी थी कि स्वर्ग के समस्त देवताओं की ईर्ष्या और द्वेषपूर्ण नजरें लक्ष्मी पर पड़ने लगीं। अंततः सभी की यह कोशिश होने लगी कि इस अद्भुत रचना को समाप्त कर दिया जाए।
प्रजापति ने एक पिता होने के नाते ईर्ष्यालु देवताओं को रोका और उनसे विनती की कि एक नारी का संहार तुम्हें शोभा नहीं देता। इसका वध मत करो, भले ही समस्त गुणों से इसे वंचित कर दो।
ईर्ष्यालु देवताओं ने एक-एक करके लक्ष्मी का भोजन, राज्य, सत्ता, सृष्टि, उच्च स्थान, शक्ति, पवित्र तेज, आवास, धन-वैभव और सौंदर्य वापस ले लिए। सुंदरता और समस्त गुणों के छिने जाने पर दु:खी हो लक्ष्मी प्रजापति की शरण में गईं। तब प्रजापति ने लक्ष्मी को दसों देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जप-तप करने की सलाह दी। लक्ष्मी ने ऐसा ही किया। समस्त देवताओं के प्रति यज्ञ-अनुष्ठान आदि कर उन्होंने अपने सभी गुणों को वापस प्राप्त किया।
इस कथा में यह संदेश छिपा हुआ है कि हर एक को अपने व्यक्तित्व का निर्माण और उसकी रक्षा स्वयं ही करनी होती है, चाहे वह देवी-देवता ही क्यों न हो।
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