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आधुनिक युग का अग्नियुद्ध
एक परंपरा जिसमें घायल होते हैं कई लोग
श्रुति अग्रवाल
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ीवाली की जगमगाहट, पटाखों की रंगीन रोशनी और धमाकों के बाद वेबदुनिया आपको रूबरू करा रही है एक और ीवाली से। इस ीवाली में रोशनी है, चिंगारी है, धमाका है, लेकिन साथ ही है युद्ध। हम यहाँ बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश के इंदौशहर के पास गौतमपुरा क्षेत्र में खेले जाने वाले हिंगोट युद्ध की।

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युद्ध में दोनों समूह अंधाधुँध तरीके से एक-दूसरे पर हिंगोट बरसाते हैं। हर साल खेले जाने वाले इस अग्नियुद्ध में चालीस से पचास लोग घायल हो जाते हैं। लेकिन फिर भी गाँव वालों का इस युद्ध के प्रति लगाव कम नहीं होता।
हिंगोट गौतमपुरा क्षेत्र में खेला जाने वाला एक परंपरागत खेल है, जिसे युद्ध का रूप दिया जाता है। यूँ तो इस युद्ध में हर साल काफी लोग जख्मी होते हैं, लेकिन फिर भी गाँव वालों का उत्साह कम नहीं होता। इस युद्ध की तैयारियों के लिए गाँववासी एक-डेढ़ माह पहले से ही कँटीली झाड़ियों में लगने वाले हिंगोट नामक फलों को जमा करते हैं। फिर फलों के बीच में बारूद भरा जाता है।

इस बारूद भरे देसी बम को एक पतली-सी डंडी से बाँध देसी रॉकेट का रूप दे दिया जाता है। बस फिर क्या, गाँव के बच्चे, बूढ़े और जवान इंतजार करने लगते हैं दीवाली के अगले दिन का, जिसे हिंगोट युद्ध के नाम से पहचाना जाता है। यह युद्ध दो समूहों- कलंगा और तुर्रा के बीच खेला जाता है।

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युद्ध में दोनों समूह अंधाधुंध तरीके से एक-दूसरे पर हिंगोट बरसाते हैं। हर साल खेले जाने वाले इस अग्नियुद्ध में चालीस से पचास लोग घायल हो जाते हैं, लेकिन गाँव वालों का इस युद्ध के प्रति लगाव कम नहीं होता। गाँव से बाहर पढ़ने या नौकरी करने वाले लोग भी हिंगोट के समय गाँव जरूर लौटते हैं।

यह युद्ध कब और कैसे शुरू हुआ, इस बारे में कोई नहीं जानता, लेकिन हर साल दीवाली के दूसरे दिन शाम पाँच बजे से लोग इस युद्ध को खेलने के लिए मैदान में डट जाते हैं।

यहाँ के लोगों का मानना है कि इस युद्ध में उनकी गहरी आस्था है। युद्घ खेलने से पहले बाकायदा गाँव के मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है। फिर यह युद्ध शुरू किया जाता है। दोनों ओर योद्धा हिंगोट और बचाव के लिए ढाल लेकर खड़े हो जाते हैं और शुरू हो जाता है खतरनाक खेल। एक बार शुरू होने के बाद यह युद्ध तब तक चलता है जब तक आखिरी हिंगोट खत्म न हो जाए।

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बीस सालों से हिंगोट खेलने वाले कैलाश हमें बताते हैं कि यह युद्ध उनके गाँव की परंपरा है। वे कई बार घायल हो चुके हैं, लेकिन इसे खेलना छोड़ नहीं सकते। वहीं राजेंद्र कुमार बताते हैं कि वे पिछले एक माह से हिंगोट जमा करने और उसमें बारूद भरने का काम कर रहे हैं। पिछले साल हिंगोट उनके मुँह पर लगा था। इलाज के समय पाँच टाँके भी आए थे, लेकिन इन सबके बाद भी वे हिंगोट खेलना छोड़ नहीं सकते। इस साल वे दुगने उत्साह से हिंगोट खेल रहे हैं।
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