- पं. बाबूलाल जोशी
वस्तुतः 'फेंग शुई' चीन द्वारा विकसित भवन निर्माण शास्त्र का नाम है। इसका शाब्दिक अर्थ 'वायु-जल' होता है। इसके द्वारा आसपास के वातावरण से लाभ प्राप्त करने तथा तादात्म्य स्थापित करते हुए भवन और मानव निर्मित संरचनाओं की स्थापना और स्थान निर्धारित किया जाता है।
हम सब सौर परिवार के सदस्य होने के नाते अनुवांशिक प्रभाव लिए हैं। हम सब पंचतत्वों से रचे-बसे हैं और सारी सृष्टि पंचतत्व के अधीन है। अतः ज्योतिष में ग्रहों, राशियों के पंचतत्वीकरण के साथ वास्तुशास्त्र में भी इसकी प्रधानता है। यों तो वास्तुशास्त्र का आरंभ वैदिककाल में विश्वकर्मा तथा मय नामक तत्कालीन वास्तु ऋषियों द्वारा आरंभ हो गया था और इन लोगों के पास तकनीकी विशेषज्ञों से लेकर सिलावट, सुतर, लोहार व श्रमिकों की इतनी बड़ी तादाद में व्यवस्था थी कि वे कुछ ही समय में बड़े-बड़े भवनों, नगरों, रास्तों तथा पुलों का निर्माण कर लेते थे। | वस्तुतः 'फेंग शुई' चीन द्वारा विकसित भवन निर्माण शास्त्र का नाम है। इसका शाब्दिक अर्थ 'वायु-जल' होता है। इसके द्वारा आसपास के वातावरण से लाभ प्राप्त करने तथा तादात्म्य स्थापित करते हुए भवन स्थापना और स्थान निर्धारित किया जाता है। |
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पंच तत्वों के तालमेल पर अर्थात ज्योतिष पर आधारित सिद्धांत दो हजार वर्ष पहले आचार्य वराहमिहिर और उसके बाद ग्यारहवीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा क्रमशः वृहत्संहिता तथा समरांगण सूत्रधार द्वारा वास्तुशास्त्र व्यवहार में आया और यह वास्तु ज्योतिष के नाम से प्रचलित हुआ अर्थात वास्तु ज्योतिष के उद्गम का श्रेय भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश के पश्चिमी मालवा को पहुँचता है जहाँ उज्जैन (कायथा) से आचार्य वराह मिहिर और धार के राजा भोज द्वारा वास्तु ज्योतिष के सैद्धांतिक व वैज्ञानिक पक्ष का व्यावहारिक प्रयोग निर्धारित किया गया है।
गत एक दशक में वास्तुशास्त्र की ओर रुझान न केवल बढ़ा है वरन उनके परिणाम भी मिलने वास्तुशास्त्र की ओर आस्थाएँ भी जगी हैं। प्रायः सभा, संगोष्ठियों व सम्मेलनों द्वारा वास्तु ज्योतिष की पहचान निरंतर बढ़ रही है। फिर भी भारतीय वास्तुविदों का ध्यान भारतीय तत्व मीमांसा की अपेक्षा चीनी वास्तुशास्त्र 'फेंग शुई' की ओर अधिक जा रहा है।
जबकि वहाँ भी भारत की भाँति पंचतत्व के सिद्धांतों पर आधारित वास्तुशास्त्र प्रचलित है और यह मूल रूप से भारतीय वास्तुशास्त्र के नियमों पर ही आधारित है क्योंकि यह तिब्बत के रास्ते बौद्धों द्वारा चीन पहुँचा है और इसलिए भी कि भारतीय वास्तुशास्त्र के अनेक मानक सिद्धांतों के वहाँ व्यावहारिक प्रयोग देखे जा सकते हैं।
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