कलियुग में तीन देवों का मिलन भगवान दत्त जिनके दर्शन से होते हैं ग्रह दोष दूर
माता अनुसूया की परीक्षा लेने गए ब्रह्मा, विष्णु, महेश को बाल रूप में बना दिया। कथा तो जग को मालूम ही है। तीन देवियाँ माँ सरस्वतीजी, पार्वतीजी व लक्ष्मीजी अपने पति को पाने हेतु सती के यहाँ पहुँची। उन्हें अपने पति बाल रूप में दिखे। अनुसूयाजी से अनुनय विनय कर अपने पतियों को पुन: प्राप्त किया, लेकिन माँ की ममता से तीनों देव भगवान दत्तात्रय के रूप में प्राप्त हुए।
महर्षि के यहाँ नन्ही किलकारी के रूप में दत्तात्रय भगवान से घर आँगन महक गया। वे कलियुग में साक्षात भगवान त्रिदेव के अवतार माने गए। आपका अवतार आंध्रप्रदेश के पीरापुरा में 24 नवंबर 1320 को शाम के वक्त हुआ। इस समय वृषभ लग्न वृषभ राशि व सिद्ध योग था।
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भी वृषभ लग्न वृषभ राशि व रोहिणी नक्षत्र में हुआ। आपने भी अनेक रूपों में लीलाएँ की उसी प्रकार भगवान दत्तात्रय भी भक्तों को कई रूप में दिखाई देते रहे। आपकी पत्रिका में लग्नेश शुक्र सप्तम से होकर लग्न को देख रहा है, वहीं तृतीयेश पराक्रम भाव का चंद्रमा उच्च का होकर लग्न में है। अत: आपको तीनों महादेवों की मुख मंडल की शोभा मिली। आपके साथ में रहने वाला सर्वप्रिय श्वान रहा जो तृतीयेश में केतु के होने से हुआ। | | माता अनुसूया की परीक्षा लेने गए ब्रह्मा, विष्णु, महेश को बाल रूप में बना दिया। कथा तो जग को मालूम ही है। तीन देवियाँ माँ सरस्वतीजी, पार्वतीजी व लक्ष्मीजी अपने पति को पाने हेतु सती के यहाँ पहुँची। उन्हें अपने पति बाल रूप में दिखे। |
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सूर्य का सप्तम में मित्र राशि का होना व सप्तम में शुक्र का अस्त होना दाम्पत्य जीवन नहीं रहा, वहीं शनि की लग्नस्थ चंद्र पर दृष्टि ने महान योगी व भगवान के रूप में पूजा जाना संभव हुआ। जितने भी महान पुरुष हुए, उनका पत्रिका में भाग्येश शनि का चंद्र से जो मन का कारक है, शनि मोक्ष का कारक है, से संबंध रहा। अष्टम भाव ख्याति का होता है।
इस भाव में धनेश व पंचमेश बुध के साथ स्वराशिस्थ गुरु का होना ही यश प्रतिष्ठा व ख्यातिदायक रहा। अष्टम योग का होता है, इसमें गुरु स्वराशिस्थ या उच्च का हो तो ऐसा जातक भोगी नहीं होता, बल्कि साधु-संतों सा रहता है। शनि की राशि में मंगल उच्च का होकर राहु के साथ रहा। अत: आप शक्ति-संपन्न भी हो।
आपके भाइयों का न होना भी मंगल नीच दृष्टि तृतीय भाई भाव पर पड़ने के कारण हुई। आपकी पत्रिका में गुरु-चंद्र, शनि वर्गोत्स है। वर्गोत्स वह होता है, जो लग्न व नवांश में एक ही राशि का हो। वर्गोत्स ग्रह सर्वाधिक शुभ परिणाम देने वाले होते हैं। अत: आज भी आपके दर्शन मात्र से शुभ ग्रहों के प्रभाव में वृद्धि होती है।
गुरु, मंगल मित्र दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से ही। शनि की दशम दृष्टि अष्टम भावस्थ गुरु पर वे शनि की गुरु की राशि में होना ही युग-युगों कि आपका स्मरण होता रहेगा।
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