- पं. कैलाश मेहता, ऋतु मेहता, केसूर
ज्ञातव्य है कि 16 अप्रैल 2003 को रात्रि 8.31 बजे से 11 मई 2003 दिन के 3.43 बजे तक छः ग्रहों का उच्च राशिगत योग था, जिसमें 2 मई 2003 रात्रि 8.34 बजे से 5 मई 2003 को प्रातः 9.05 बजे तक सप्तग्रही उच्च राशिगत योग रहा। विशेषकर स्थान इंदौर की 3 मई 2003 को दिन के 11 बजे की लग्न कुंडली में सप्तग्रही उच्च राशिगत योग दर्शाया गया है।
कालरुद्र के वचनानुसार राहु वृषभ व केतु वृश्चिक राशि में उच्च का होना देवज्ञों द्वारा स्वीकार है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए लेख में दी गई भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण व राक्षस राज लंकाधिपति रावण की जन्म कुंडलियों पर गौर किया गया। विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण की जन्मकुंडली पर, जिसमें चार ग्रह उच्च राशिगत दर्शाए गए हैं तथा भगवान श्रीराम की कुंडली में पाँच ग्रह उच्च राशिगत दर्शाए गए हैं। इसमें ज्ञात हो कि शास्त्रों में निर्विवाद रूप से श्रीराम को बारह कलायुक्त व श्रीकृष्ण को सोलह कलायुक्त माना गया है।
इस संबंध में सप्रमाण हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कुंडली में छः ग्रह उच्च राशिगत पाए गए हैं, जिन्होंने उनकी कलाओं में वृद्धि की व उन्हें परिपूर्णतम जातक सिद्ध किया। कुंडली व शास्त्रोक्त प्रमाण-महान भारत के महान विद्वान काशी निवासी प्रातः स्मरणीय श्री दौलतरामजी गौड़ द्वारा वाराणसी से प्रकाशित श्रीमद् भागवत भाषा टीका कृत चतुर्थ स्कन्ध के अंत में टिप्पणी के अंतर्गत पृष्ठ क्र. 64 पर भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कुंडली मतान्तर भेद से दी गई है, जिसमें उनकी कुंडली में छः ग्रह उच्च राशि के दर्शाए गए हैं। जो इस प्रकार दृष्टव्य है-
श्रीकृष्ण की जन्म कुंडली इसके साथ ही इस कुंडली में अन्य विशिष्ट फलदायी योगों का संयोग बना है। फलस्वरूप इस जातक को देवत्व की प्राप्ति व परिपूर्णतम अवतारी पुरुष होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अन्य शास्त्रोक्त प्रमाण में
रावण की जन्म कुंडली लंकाधिपति रावण की जन्म कुंडली में मात्र तीन ग्रह उच्च राशिगत थे। शास्त्रानुसार तीन ग्रह उच्च के होने पर जातक को राजयोग बनता है व उसे पराक्रमी बनाता है। कुंडली दृष्टव्य है-इससे यह सिद्ध होता है कि श्रीराम और रावण की कुंडली में राम को पंच उच्च ग्रही योग होने के कारण सशक्त रावण पर भी विजय प्राप्त हुई।
अब विषयान्तर करते हुए देखिए प्रातः स्मरणीय परम पूज्यपाद श्री डोंगरेंजी महाराज की जन्म कुंडली-इस कुंडली में चार ग्रह उच्च के दृष्टिगोचर हैं जिन्होंने इस जातक को उच्च श्रेणी का विद्वान व विद्वानों में शिरोमणि बनाया। वे साक्षात सरस्वती के वरद् पुत्र तथा श्रीकृष्ण के परम भक्त हुए। होने को तो मात्र एक ग्रह भी उच्च का हो तो जातक को परम वैभव संपन्नता प्राप्त हो सकती है।
उदाहरणार्थ- देवताओं के कोषाध्यक्ष, धनाध्यक्ष श्री कुबेर की जन्मकुंडली दृष्टव्य है-इसे एक चतुर्ग्रही योग का उदाहरण भी माना जा सकता है। इसी प्रकार एक भी ग्रह उच्च का न होने पर अन्य योग प्रबल होने पर जातक को उच्चस्थ पद प्राप्त हो सकता है। उदाहरणार्थ- श्री नरकाधीश्वर यमराज महाराज की जन्मकुंडली दृष्टव्य है-इस कुंडली के जातक को केवल सप्तग्रही योग ने अधीश्वर बनाया।
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