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रावण विजयी राम का दाम्पत्य सदैव दुःखी रहा
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षष्ट भाव शत्रु का है। षष्ट भाव का भावाधिपति गुरु लग्न में उच्च का बैठा है, जो शीतल ग्रह चंद्र के साथ है। अतः राम यदि चाहते तो रावण को क्षणभर में ही मारकर माँ सीताजी को ले आते, लेकिन चंद्र-गुरु ने भगवान को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाया। गुरु ज्ञान का प्रतीक है तो चंद्र भावना प्रधान। अतः भगवान राम ने अपने कट्टर शत्रुओं पर भी दया का भाव रखा।

दाम्पत्य जीवन के बारे में देखा जाए तो गुरु की नीच दृष्टि सप्तम भाव पर पड़ रही है, वहीं चंद्र की समदृष्टि भी सप्तम भाव पर पड़ रही है। अतः पत्नी सुख तो रहा, लेकिन सुखी जीवन वाली बात नहीं रही। भाइयों का सहयोग राहु का तृतीय भाव में मित्र का होकर बैठने की वजह से मिला। मंगल की अष्टम दृष्टि लग्न पर नीच पड़ रही है, लेकिन चंद्र पर पड़ने से अखण्ड साम्राज्य का राजा भी बनाती है।

जिस मंगल ने यह योग दिया, वही भगवान रामचंद्रजी ने अश्वमेघ यज्ञ रावण का अन्त करने के बाद अपने राज्य को अखण्ड बनाने हेतु किया और अश्व को छो़ड़ा। जो अश्व को पकड़ेगा, उसे युद्ध का सामना करना पड़ेगा। अतः किसी राजा ने तो अश्व को नहीं पकड़ा, लेकिन उन्हीं के पुत्रों लव व कुश ने पकड़ा।
जिस मंगल ने यह योग दिया, वही भगवान रामचंद्रजी ने अश्वमेघ यज्ञ रावण का अन्त करने के बाद अपने राज्य को अखण्ड बनाने हेतु किया और अश्व को छो़ड़ा। जो अश्व को पकड़ेगा, उसे युद्ध का सामना करना पड़ेगा।


चूँकि मंगल षष्ट भाव में व गुरु षष्टेश भी है, उसकी नीच दृष्टि सप्तम भाव पर पड़ रही है, अतः स्त्री के शत्रु जो बाद में भी बने रहे, उसके कारण सीताजी को वनवास फिर अकेले जाना पड़ा और जंगल में वाल्मीकि आश्रम में एक पुत्र लव को जन्म दिया। सीताजी पुत्र को आश्रम में छोड़कर जल भरने चली गईं, जब गुरु ने आश्रम में सीताजी के निवास से बालक के रोने की आवाज नहीं सुनी तो गुरु ने कुश का पुतला बनाकर पालने में रख दिया, जबकि लव पालने में से गिर कर दूर खिसक गए थे व चुपचाप खेल रहे थे। कुश सजीव हो गए।

माता सीता आई तो देखा कि लव एक तरफ खेल रहे हैं व पालने से रोने की आवाज सुनी। वहाँ देखा तो एक और बालक था, बाद में यही बालक कुश के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्हीं दोनों भाइयों ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ा था व अन्त में राम को युद्ध करने पर मजबूर कर दिया था। इसका कारण भी शनि-मंगल ग्रह ही रहा। वहीं सीताजी का धरती में समाना भी मंगल व शनि का कारण ही बना, वहीं राम का जल समाधि लेना शनि की चंद्र पर दशम दृष्टि पड़ रही है, जो लग्न पर है और शनि मार्केश है, जो चंद्र की राशि कर्क पर व चंद्र पर पड़ रही है।

चंद्र जल तत्व राशि है व जल तत्व ग्रह को देख रहा है। इस प्रकार मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अपना शरीर जल समाधि लेकर त्यागा। आज के युग में ही नहीं, बल्कि युगो-युगांतर तक भी ऐसे महान भगवान रामचंद्रजी नहीं होंगे।
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