मुख्य पृष्ठ > धर्म-संसार > ज्योतिष > सितारों के सितारे
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
रावण विजयी राम का दाम्पत्य सदैव दुःखी रहा
पं. अशोक पँवार 'मयंक'
ND
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म पौराणिक मतानुसार त्रेतायुग में चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को दोपहर 12 बजे कर्क लग्न में राजा दशरथजी के यहाँ अयोध्या में हुआ। लग्नाधिपति चंद्र लग्न में भाग्येश व षष्टेश गुरु के साथ विराजमान हैं। गुरु-चंद्र की युति गजकेसरी योग बना रही है, जो राजयोग भी है एवं गुरु उच्च का होने से हंस योग भी बनता है। अतः भगवान राम शांत स्वभाव वाले, विद्वान, नीतिज्ञ, धर्मप्रेमी, सरल हृदय, भगवान धर्म परायण से युक्त हुए। इनके जीवन में निरंतर शत्रुओं से परेशानियाँ रहीं।

शनि सप्तमेश होकर चतुर्थ भाव में उच्च का बैठा है, वहाँ से तृतीय दृष्टि षष्ट भाव पर शत्रु दृष्टि पड़ रही है, वही शनि मंगल को भी तीसरी दृष्टि से देख रहा है। अतः शत्रु पत्नी के द्वारा, यदि रावण माता सीता को नहीं ले जाता तो शत्रु कोई नहीं था। सुख चतुर्थ भाव से देखा जाता है। अतः चतुर्थ भाव में शुक्र की राशि तुला है, उसका स्वामी शुक्र भाग्य भाव में उच्च का होकर केतु के साथ बैठा है, लेकिन चतुर्थ दृष्टि मंगल की शुक्र व केतु पर पड़ रही है। अतः दाम्पत्य सुख होते हुए भी सुखी जीवन न रहकर अशांत ही रहे। यहाँ पर पिता-पुत्र का साथ रहना भी गँवारा नहीं करते।

ये ग्रह शनि व सूर्य दोनों ही उच्च के हैं, जब कभी सूर्य व शनि आमने-सामने होते हैं, तो पिता-पुत्र में प्रेम होते हुए भी विरक्ति रहती है, जो भगवान रामचंद्रजी के जीवन में देखने को मिलती है। राज सुख को देखा जाए तो धनेश सूर्य उच्च का होकर दशम पिता के भाव में बैठा है, अतः पिता का धन व राज्य सुख तो मिलेगा, लेकिन दशमेश मंगल षष्ट भाव में होने से शत्रुओं द्वारा कष्टपूर्ण लाभ रहा।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म पौराणिक मतानुसार त्रेतायुग में चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को दोपहर 12 बजे कर्क लग्न में राजा दशरथजी के यहाँ अयोध्या में हुआ। लग्नाधिपति चंद्र लग्न में भाग्येश व षष्टेश गुरु के साथ विराजमान हैं।


भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ ही नहीं और कैकई द्वारा मन्थरा के कुचक्र में आकर राम को 14 वर्ष के लिए पिता के कहने पर वनवास जाना पड़ा। ये सब ग्रहों के कारण ही हुआ। जब तक पिता जीवित रहे, राम कभी भी पिता के साथ रहकर सुख नहीं भोग सके।

पराक्रमेश व द्वादशेष शुक्र शत्रु राशि का होकर लाभ स्थान में बैठा है, अतः पराक्रम का व बाहरी साथियों जैसे महाबली बजरंग का साथ मिला, वहीं विभीषण का भी मार्गदर्शन रहा। नल-नील का व अन्य वानरगणों का भरपूर सहयोग मिला, क्योंकि मंगल का प्रभाव बुध ने ले रखा है। मंगल साहस बल का प्रतीक है। अतः राम को शत्रुओं पर विजय अपने पराक्रम व धैर्य के बल पर रावण को नष्ट कर मिली।
1 | 2  >>  
और भी
राहुल की राह आसान नहीं !
अगले दो वर्ष अमिताभ-अभिषेक के लिए ठीक
गणेश को ग्रहों ने बनाया गणनायक
मैडम मायावती
महान कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण
गजकेसरी योग से भाग्यशाली हैं सलमान