- पं. अशोक पंवार 'मयंक'
मुंबई में 24 अप्रैल 1973 को जन्मे सचिन तेंदुलकर ने मात्र 16 वर्ष की उम्र में भारतीय क्रिकेट टीम में स्थान बनाया। अपना प्रथम टैस्ट मैच नवम्बर 1989 में पाकिस्तान के विरुद्ध अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी जगह बनाई और कीर्तिमान स्थापित करने का दौर शुरू किया।
सचिन का जन्म वृश्चिक लग्न में हुआ तथा लग्न का स्वामी मंगल अपनी उच्च राशि तथा स्वयं के नक्षत्र धनिष्ठा में है। साथ ही तीसरे भाव में आकर अत्यंत बलवान हो गया है तीन, छह तथा ग्यारहवें भाव में पाप ग्रह अत्यंत बलवान होते हैं। तीसरा भाव कंधों का होता है, यही मंगल छठे भाव का स्वामी होकर तीसरे भाव में बैठा है। यह योग परमान भंजक कहलाता है। इसमें व्यक्ति शत्रुओं का परमनाशक तथा मान खंडित करने वाला होता है। चौथा भाव जनता का भाव होता है तथा शनि जनता का कारक ग्रह होता है चौथे भाव का स्वामी अपने स्थान से चौथे भाव में आकर उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बना रहा है, इस शनि पर गुरु की पाँचवीं दृष्टि है, जो इस कार्य के लिए उन्हें आशीर्वाद दे रही है।
गुरु पंचम भाव तथा कुटुम्ब भाव का स्वामी होकर तीसरे भवन में मकर राशि में उच्च के मंगल के साथ नीच भंग राजयोग का सृजन कर रहा है। इसी गुरु के कारण उनकी शिक्षा कम हुई। दशम भाव तथा पिता पक्ष का स्वामी सूर्य छठे भाव में शुक्र के साथ अपनी उधा राशि में बैठा है। छठे घर में सूर्य प्रबल शत्रुहंता बनता है। छठे घर का शुक्र व्यक्ति के लिए काफी योगकारी होता है, भोग, विलास, ऐश्वर्य के साधन उपलब्ध करता है, भाग्य का स्वामी चन्द्रमा राहु के साथ द्वितीय भाव में बैठा है। चन्द्र राहु की युति व्यक्ति की कल्पनाओं को काफी ऊँचाइयाँ देती है। सचिन की पत्रिका में कालसर्प योग भी है। कालसर्प योग व्यक्ति को विख्यात बनाता है, साथ ही ऊँचाइयाँ भी देता है।
सचिन राहु की महादशा लगते ही काफी लोकप्रिय हो गए, इसी महादशा ने उन्हें ख्याति धन, मान-सम्मान दिया। कलयुग में राहु परम योगकारी होता है क्योंकि कलयुग का राजा राहु स्वयं ही है। राहु में शनि की अंतरदशा के चलते उन्हें वापस कप्तानी तो अवश्य मिली, परन्तु शनि राहु के मध्य षडाष्टक योग उनके लिए कष्टकारी सिद्ध हुआ। आपकी कुण्डली में सम्मान पाने के कई योग हैं। अतः आपको भारत सरकार द्वारा तथा कई अन्य देशों द्वारा भी उच्च सम्मान प्राप्त होने के योग बनते हैं।
कुण्डली की विशेषताएँ * लग्नेश मंगल की अपनी उच्च राशि में गुरु के साथ तीसरे भवन में स्थिति। * गुरु तथा शनि का नवपंचम योग शनि पराक्रम और सुख भाव का स्वामी होकर पूर्णतः गुरु की शुभ दृष्टि में है। * शनि का चौथे भाव से चौथे भाव (सप्तम) में अपनी प्रिय राशि वृषभ में जाकर दसवीं दृष्टि से चौथे भवन पर दृष्टि यह योग सचिन की महान लोकप्रियता का कारक बना। * सूर्य का अपनी उच्च राशि में छठे भाव में बैठना शत्रुओं के लिए अनिष्टकारी होना कर्मक्षेत्र के गौरव, यश, उच्चता तथा प्रतिष्ठा को दर्शाता है। सचिन की पत्रिका का कालसर्प योग जो अचानक उनकी उन्नति का कारण बना।
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