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नवग्रह
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- पंडित बृजेश कुमार रा

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सौरमंडल में विचरण करते ग्रहों एवं उपग्रहों के अलावा विविध नक्षत्रों का अचूक प्रभाव समस्त चराचर जगत पर पड़ता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण समुद्र में आने वाला नियमित ज्वारभाटा है। यह ज्वारभाटा चन्द्रमा की विविध स्थिति के अनुसार होता है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों का प्रभाव भी संसार के प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु एवं सजीव-निर्जीव आदि पर पड़ता है।

कुंडली में जिस स्थान पर कोई ग्रह जिस भाव का स्वामी होकर प्रबल होता है। उस स्थान अथवा भाव का उत्कट फल देता है। उदाहरणस्वरूप यदि कुंडली में अष्टमेश सबल होकर चतुर्थ भाव में है। यह योग माता या सम्पत्ति को हानि देगा। यदि पंचम भाव में बैठा है तो पुत्र एवं विद्या को हानि देगा। यदि छठे भाव में बैठा है तो शत्रु एवं रोग का नाश करेगा।

इसके विपरीत यदि दशमेश बलवान होकर छठे भाव में बैठा है। तब यश एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होगी किन्तु जीवन में अस्थिरता, संतान विनाश एवं अकाल मृत्यु देगा। इस प्रकार का प्रभाव देने में शनि, गुरु एवं मंगल ये तीन ग्रह अति सक्रिय होते हैं।

प्रायः शनि एवं मंगल को परम पापी एवं अशुभ ग्रह माना गया है। यह सही भी है। किन्तु दैत्य भी अपना आवास सुरक्षित रखने की कोशिश करते हैं। ये ग्रह अपने घर को कभी नुकसान नहीं पहुँचाते। शनि एवं मंगल यदि शुभ अवस्था में हो तो परम शुभ फल देने वाले हो जाते हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि सब सुयोग होते हुए भी यदि शनि, गुरु एवं मंगल प्रबल हो तो वे सबसे पहले अपना प्रभाव दिखाते हैं। यदि सबल एवं शुभ अवस्था में हुए तो सारी अशुभताएँ छिप जाती हैं। यदि अशुभ अवस्था में हुए तो सारे सुयोग छिप जाते हैं। भले ही ग्रहराज सूर्य पूर्ण बली एवं शुभ अवस्था में क्यों न हों।
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