कुंडली के प्रत्येक भाव या खाने अनुसार शनि के शुभ-अशुभ प्रभाव को लाल किताब में विस्तृत रूप से समझाकर उसके उपाय बताए गए हैं। यहाँ प्रस्तुत है प्रत्येक भाव में शनि की स्थित और सावधानी के बारे में संक्षिप्त और सामान्य जानकारी।
WD
विशेषता : भैंस या भैंसा, सर्प
(1). पहला खाना : यहाँ पर स्थित शनि यदि शुभ है तो व्यक्ति सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की इच्छा रखता है। लोककल्याण के लिए सदा तत्पर रहता है। राजनेता या अधिकारी बन सकता है।
सावधानी : दगाबाजी और झगड़ालू प्रवृत्ति से बचें। शिक्षा और नौकरी के प्रति गंभीर व जिम्मेदार रहें। पत्नी और माँ का ध्यान रखें।
(2) दूसरा खाना : यहाँ स्थित शनि को गुरु की शरण में कहा गया है। अर्थात गुरु की बुद्धि से चलने वाला। उसे जमीन-जायदाद से लाभ मिल सकता है। धार्मिक प्रवृत्ति वाला रहेगा।
सावधानी : जुआ, सट्टा, लॉटरी के चक्कर में न पड़ें। वैराग्य भाव न रखें। सदा प्रसन्नचित्त रहें।
(3) तीसरा खाना : यहाँ स्थित शनि यदि शुभ हो तो गंभीर, शांतचित्त और विवेकशील होता है। धर्मपरायण और गुप्त विद्या के प्रति रुचि रखने वाला। दीर्घायु होता है।
ND
सावधानी : छोटे भाई और बहनों का ध्यान रखें। पूर्व या दक्षिण दिशा में मकान का प्रवेश द्वार न रखें। दरवाजे के पास पत्थर गढ़ा या रखा हुआ न हो। मकान के आखिरी में यदि अँधेरी कोठरी हो तो उसमें रोशनी के रास्ते न निकालें।
(4) चौथा खाना : यहाँ स्थित शनि को पनियारा साँप कहा गया है। पूर्वजों की सम्पत्ति प्राप्त हो सकती है। जमीन-जायदाद और भवन निर्माण के कार्य में लाभ।
सावधानी : पराई स्त्री के चक्कर में न रहें। रात में दूध न पिएँ। माता-पिता का ध्यान रखें।
(5). पाँचवाँ खाना : यहाँ स्थित शनि को संतान के लिए अच्छा नहीं माना गया है। इसे बच्चे खाने वाला साँप कहा गया है। शनि को पंचम भाव में बहुत ही बुरा माना जाता है लेकिन सावधानी और उपाय से इसका बुरा असर खत्म हो जाता है।