बुध ग्रह उत्तर दिशा का स्वामी, नपुंसक, त्रिदोष प्रवृत्ति, श्याम वर्ण व पृथ्वी तत्व का है। यह पाप ग्रहों सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु के साथ या उनकी राशि पर रहने पर अशुभ फल और शुभ ग्रहों पूर्ण चंद्रमा, गुरु, शुक्र के साथ रहने पर शुभ फल देता है।
बुध ग्रह पंचम और दशम स्थान में कारक, चतुर्थ स्थान में निष्फल होता है। इससे जिव्हा, तालु, उच्चारण अवयवों एवं वाणी दोष, गुप्त रोग, संग्रहणी, बुद्धि भ्रम, मूक, आलस्य, वात रोग, श्वेत कुष्ठ आदि रोगों का विचार होता है। पन्ना एवं उप रत्न, हरित बुध ग्रह के शुभाशुभ फल हेतु धारण करना चाहिए।
बुध ग्रह 32वें वर्ष में जातक का भाग्योदय करता है। राजस गुणधारी बुध प्रातः में कालबली व 7वें स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है। इसके सूर्य, शुक्र, राहु मित्र ग्रह, मंगल सम तथा गुरु-शनि शत्रु ग्रह होते हैं। यह मिथुन-कन्या पर स्वग्रही, कन्या राशि के 15 अंश तक उच्च का तथा मीन राशि पर नीच का रहता है।
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यह स्वराशि, उच्च राशि, वृषभ, तुला, मकर, कुंभ, सिंह राशि में शुभ फल देता है। बुध हमेशा सूर्य से अधिकतम 30 अंश के आगे-पीछे या प्रायः साथ ही रहता है। सूर्य के साथ बिना अस्त के बुध से बुध-आदित्य एक शुभ योग बनता है, जिससे जातक विद्वान, विद्यावान एवं ऐश्वर्यवान होता है।
भृगु सूत्र के अनुसार बुध के शुभ होने पर जातक विद्यावान, विनय सिंधु, नाना शास्त्रों का ज्ञाता, भ्रमणशील यंत्र-तंत्र-मंत्र का ज्ञाता, प्रिय मधुर भाषी, क्षमाशील, दयालु होता है। 27 वें वर्ष में लंबी यात्राएँ करता है। पाप ग्रहयुक्त होने पर पांडु रोग होता है। शुभ ग्रहों से दृष्ट बुध से जातक निरोग, उच्च बुध से मोक्ष प्राप्त करता है।
अशुभ बुध से जातक रोगी, कपटी, पंगु, धोखेबाज व भ्राता विरोधी होता है। चंद्र कुंडली में गोचर बुध से 2/4/6/8/10/11 शुभ होने से भाग्योदय, धनलाभ तथा सब सुख मिलते हैं। 1/3/5/7/9/12 स्थानों पर गोचर बुध वेध होने से अशुभ फल देता है। गोचर बुध एक राशि में एक माह भ्रमण करता है।